लिख रहा हूँ, मिटा रहा हूँ,
उसका नाम ज़िंदगी की रेत पर।
बड़ी मशक्कत से सजाया था जो लम्हा,
बिखर गया वो हवा के एक संकेत पर।
उम्र भर की प्यास का हासिल यही है,
सिर्फ अश्क ठहरे हैं मेरी पलक के खेत पर।
तमाम उम्र का हिसाब बस इतना ही है,
हँसते हुए दिल को लगा है पहरा ज़ब्त के गेट पर।
अब कोई उम्मीद नहीं उस मकां से हमें,
जहाँ से लौट आए हम एक बार बे-वजह के खेद पर।