मैं और मेरे अह्सास
बेवफ़ा मेहबूबा
बेवफ़ा मेहबूबा की याद से निकलना चाहता हूँ l
नया सवेरा नई जिंन्दगी में ढलना चाहता हूँ ll
एक तरफ़ा मोहब्बत का शिकार होकर आज l
अपनी ही लगाई हुई आग में जलना चाहता हूँ ll
कोई उम्रभर किसीका हाथ पकड़े नहीं चलता l
खुद की मर्जी से ख़ुद की राह चलना चाहता हूँ l
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह