सूना-सूना घर का आँगन
सूना-सूना घर का आँगन
कर रही कबसे इंतजार
चौबारे पर बैठी माँ
आयेगा मेरा बेटा
भर लेगा बाँहों में
पूछेगा कैसी हो माँ
राह निहारे बूढ़ी माँ
सोच रही कैसे रहता होगा
खाना भी क्या खाता होगा
दूर ना मुझसे रह पाता था
छोटा था जब पास वो रहता
घूमता रहता आगे-पीछे
एक पल को ओझल जो हो जाती
बेचैन हो रोता फिरता
कहाँ छपी हो मेरी माँ
टप-टप आँसू टपक रहे हैं
बेटे की राह तकती बेचारी माँ
आयेगा एक दिन पुकारेगा
कहाँ हो मेरी प्यारी माँ
पर आया ना बेटा
हो गई साँझ, ढल गया दिन
बीत जाता है ऐसे ही राह निहारे
रोज का एक दिन
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली