अब तक उपेक्षित रहा लिखने से
अब तक उपेक्षित रहा लिखने से
पुरुषों का दर्द लिखना पाया कोई
दर्द तो उन्हें भी होता है
चोट तो उन्हें भी लगती है
धोखे तो उन्हें भी मिलते हैं
संघर्ष तो उनके जीवन में
भी होता है बहुत
अब तो विदा होते हैं लड़के भी
कभी पढ़ाई के लिए
कभी रोजगार के लिए
छोड़ना पड़ता है घर
पिसता तो आदमी भी है
रिश्तों के बीच संतुलन के लिए
शौक अपने मारकर
परिवार को पालता है
दो शब्द प्यार के वो भी
तो चाहता है
है तो आखिर मनुष्य ही
कुछ कमियां स्वाभाविक हैं
लेकिन हर समय करना
उन्हें उपेक्षित और अकेला
गलत है, गलत है
संवेदनाएं तो उनकी भी होती हैं
खेलना उनसे गलत है
समझो उनको साथ दो उनका
एक-दूसरे को समझना ही
जिंदगी है, जिंदगी का अर्थ है