Rajesh kaliya
खामोशियों में अब तो गुज़र हो रही है,
अपनों से दूरियों की बस ख़बर हो रही है।
जिसे माँगा था दुआओं में शिद्दत से हमने,
आज उसी की चाहत में बसर हो रही है।
टूटे हुए ख़्वाबों के टुकड़े चुने हैं मैंने,
हर एक साँस में मेरी क़बर हो रही है।
ज़ख़्म इतने मिले हैं इस ज़माने से हमको,
कि अब तो ख़ुशी से भी डर हो रही है।
तू न मिला तो क्या हुआ ऐ मेरे हमसफ़र,
मेरी तन्हाइयों में अब सहर हो रही है।