वो अब बिजी हो गया है अपनी नई दुनिया सजाने में,
और मैं अब भी उलझी हूँ, उसे अपनी यादों से हटाने में।
उसे वक्त नहीं है अब, मेरी खामोशियों को सुनने का,
मेरे उन तमाम सवालों का, जो अब भी दबे हैं ज़माने में।
कभी घंटों जो मेरी आहट पर ठहर जाया करता था,
आज उसे खबर भी नहीं, कि मैं मर रही हूँ या जी रही हूँ।
वो तो अपनी कामयाबी की बुलंदियों पर खुश है बहुत,
और मैं... मैं अब भी बस अपनी ही तन्हाई को पी रही हूँ।
मजबूत बनना चाहती हूँ, कि अब उसे याद न करूँ,
पर वो 'बिजी' है—ये ख्याल मुझे और भी तोड़ देता है।
वो तो भूल चुका है मुझे, शायद एक पुराना पन्ना समझकर,
और ये दिल है कि आज भी, उसकी हर एक झूठी उम्मीद को जोड़ देता है।
कितनी अजीब है न ये मोहब्बत की आखिरी सीढ़ी?
कि उसे परवाह भी नहीं, और मैं मर रही हूँ ये सोचकर,
कि उसके पास अब मेरे लिए वक्त क्यों नहीं है?
अब खुद को आईने में देखना भी एक सजा सा लगता है,
क्योंकि मेरी आँखों में अब, उसके 'बिजी' होने का मातम दिखता है।
शायद अब वक्त आ गया है, कि मैं भी 'बिजी' हो जाऊं,
खुद को समेटने में, खुद को वापस पाने में,
और उसे हमेशा के लिए, उसकी अपनी 'बिजी' दुनिया में छोड़ आने में।
— प्रिया चौधरी
🥀🩹🦋✨