प्रेमकविता : माना हमने कहा नहीं |
माना हमने कहा नहीं, माना तुझे हम कभी दिखे नहीं,
ये दिमाग ने दिल को दुश्मन समझ लिया,
की ये दिल सच को अब मानता ही नहीं,
ये मानता नहीं की कितना हम तुझे चाहते थे,
तेरी यादों में हम कितनी रातें रोते थे,
कितनी सुबह तेरे चेहरे के आईने से हम खुद को निहारते थे,
जो रास्ता तेरा था वो मेरे प्यार का सफर बन गया,
पर अब वो सफर ही मुझे खुद को तड़पाने लगा था,
तेरे होने या न होने से मुझे फर्क पड़ने लगा था,
पर दिमाग ने इन सबको झूठा साबित किया,
और तेरा चाहना हमारे दिल का दर्द बन के रह गया,
अब चाहती हूँ बस इतना की दिमाग की बात समझ लूँ,
इस दिल के सच को ही अब राज बन के ही रखूँ,
ये प्यार जो मेरा है,
माना हमने कहा नहीं, माना तुझे वो कभी दिखा नहीं |