मितव्ययी हो गए हैं लोग
एक दमड़ी क्या खर्चेंगे
एक वर्ण भी खर्चा भारी है!
किसी की रचना पर
करो ऐसा प्रहार,
ना वो मरे और ना रहे जिंदा
जैसे हो बिन परों का परिंदा!
मैंने जो कुछ लिखा
आपने पढ़ा, नहीं चखा
स्वाद नहीं आया
या नहीं भाया?
मुझे भी कहाँ समझ में आया!
किसी का लिखा जब जब मैंने पढ़ा
मुक्त कंठ से मैंने उसे सराहा!
क्योंकि मैं था चाहता
कि आगे बढ़े वो मैया या भैया
जिसने अतुलनीय जो है कार्य किया!
मुझे प्रोत्साहन नहीं मिला
गैरों से नहीं, बल्कि अपनों से है गिला!
गैर तो टांग खींचने का करते हैं काम
अपने तो खामखां यूँ ही हो गए बदनाम?