धुली हुई प्रकृति का
धुला हुआ रूप है,
मनुष्य को ढूंढता
ये प्रकृति की कृति है।
आज जो मैं चला
कल कोई और है,
प्यार के हाथ में
उसी का आशीर्वाद है।
मौन ये टिका हुआ
आवाज सब धुली हुई,
धुली हुई प्रकृति का
संदेश तो साफ है।
जहाँ आज कदम हैं
कल राह धुली हुई,
धुली हुई प्रकृति की
मौन मन से बात हुई।
*** महेश रौतेला