मिट्टी का दीपक
एक छोटे से गाँव में एक बूढ़ा कुम्हार रहता था। उसके बनाए मिट्टी के दीपक दूर-दूर तक मशहूर थे। लेकिन समय बदल गया। लोग बिजली की रंग-बिरंगी लड़ियों से घर सजाने लगे। अब कोई उसके दीपक नहीं खरीदता था।
दीपावली आने वाली थी। कुम्हार ने फिर भी पूरी मेहनत से सैकड़ों दीपक बनाए। उसे उम्मीद थी कि इस बार शायद कुछ दीपक बिक जाएँ।
लेकिन बाज़ार में पूरे दिन बैठने के बाद भी केवल दो दीपक बिके।
निराश होकर वह घर लौट आया। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने सोचा, "शायद अब मेरी कला की किसी को ज़रूरत नहीं रही।"
उसी रात गाँव के स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की, आराध्या, अपने पिता के साथ उसके घर पहुँची।
"बाबा, क्या आपके सारे दीपक बिक गए?" उसने पूछा।
कुम्हार मुस्कुराया, लेकिन उसकी आँखों का दर्द छिप नहीं सका।
आराध्या ने अगले दिन स्कूल में एक अभियान शुरू किया— "एक घर, दस दीपक"।
उसने बच्चों को बताया कि एक छोटा-सा दीपक सिर्फ मिट्टी का नहीं होता, उसमें किसी के श्रम, उम्मीद और जीवन की रोशनी होती है।
धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह बात फैल गई।
दीपावली से एक दिन पहले कुम्हार के घर लोगों की भीड़ लग गई। कुछ ही घंटों में उसके सारे दीपक बिक गए।
जब आख़िरी दीपक भी बिक गया, तो बूढ़े कुम्हार की आँखें भर आईं।
उसने आराध्या से कहा—
"बेटी, तुमने मेरे दीपक नहीं खरीदे, तुमने मेरा आत्मविश्वास लौटा दिया।"
उस रात पूरे गाँव में मिट्टी के दीपक जले।
लेकिन सबसे ज़्यादा रोशनी उस बूढ़े कुम्हार के चेहरे पर थी, जिसने फिर से विश्वास करना सीख लिया था कि मेहनत और कला कभी व्यर्थ नहीं जाती।
शिक्षा:
कभी-कभी किसी की मदद करने के लिए बड़ी दौलत नहीं, बस एक अच्छा विचार और नेक दिल चाहिए होता है।