लौटी हुई स्त्रियाँ
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इस समाज में
जितना सरल समझा गया जाना,
उससे कहीं अधिक
संदिग्ध और दोहरे अर्थों से भरा रहा
लौट आना।
राम लौटे
तो नगर सजाया गया,
दीये जलाए गए,
देहरियों ने
आँचल से अपना माथा पोंछा
और कहा
स्वागत है।
सिद्धार्थ लौटे
तो उन्हें बुद्ध कहा गया,
उनकी चुप्पियों को
उपदेश बना दिया गया,
और उनके लौटने को
धर्म।
मगर जब सीता लौटीं
तो उनके हिस्से
आग आई।
और फूलन लौटीं
तो उनके हिस्से
गोलियाँ।
मैंने इतिहास पलटकर देखा
और पाया कि
यह सभ्यता
लौटे हुए पुरुषों से तो
प्रेरणा लेती है,
मगर लौटी हुई स्त्रियों से
आँख चुराती है।
तथाकथित पुरुष समाज
नयन-नक्श और काजल से भरी आँखों पर मर मिटता है,
उन पर कविताएँ लिखता है।
क्योंकि वो आँखें है देखी जा सकने वाली।
मगर वो असुविधाजनक हो जाते है
सवाल करती हुई स्त्रियों पे क्योंकि वो आँखें
लौटकर देखती हैं।
शायद इसलिए
हम आज भी
लौटे हुए राम पर
त्योहार मनाते हैं,
और लौटी हुई
फूलन पर
गालियाँ।
@ कुणाल कुमार