अक्सर हम दूसरों की मोहब्बत में खुद को इतना खो देते हैं कि अपनी पहचान ही भूल जाते हैं। हम उनके कॉल, उनके मैसेज और उनकी मौजूदगी के गुलाम बन जाते हैं।
लेकिन एक वक्त आता है जब इंसान टूटकर बिखरने के बजाय, खुद को समेटकर खड़ा होता है।
यह पंक्तियाँ उसी 'इरफान' के नाम, जो अब किसी का इंतज़ार नहीं करता, क्योंकि वह अब खुद के लिए 'ज़िंदा' हो गया है।
जीत का आगाज़
"खुद से खुद की जंग थी, अब मंज़र नया आगाज़ है,
कल तक जो बेड़ियाँ थीं, आज उन पर ही नाज़ है।
वो फोन की घंटियाँ, वो यादों का शोर, सब पीछे छूट गया,
जो धागा मुझे कमज़ोर करता था, वो आज जड़ से टूट गया।
दुनिया ढूँढती रही मुझे पुरानी गलियों के मलबे में,
उन्हें क्या पता, 'इरफान' अब अपनी ही मस्ती में आज़ाद है।
अब न कोई मलाल है, न किसी की वापसी का इंतज़ार,
कल तक जो मुर्दा था जज्बातों में, आज वो परिंदा आज ज़िंदाबाद है!"
एक छोटा सा संदेश (Final Thought):
सच्ची जीत किसी को हराने में नहीं, बल्कि खुद को उस जगह से बाहर निकालने में है जहाँ आपकी कद्र न हो। आज मैं कह सकता हूँ कि मैं फिर से जी उठा हूँ।