Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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कुण्डलिया छंद

जीवन की है कामना, प्रभु जानें हैं आप।
रोग शोक से दूर कर, मेंटें सब संताप।
मेंटें सब संताप , तनिक प्रभु कृपा कीजिए।
प्रेम भक्ति सद्भाव, हृदय मन-भाव दीजिए।
कह सुधीर कविराय, सरल हो मेरा तन-मन।
नहीं चाह कुछ और, सफल जन-मन का जीवन।।

जीवन को मत मानिए, यारों कोई खेल।
कहते संत महंत हैं, मत कहना तुम रेल।।
मत कहना तुम रेल, बड़ी मुश्किल आयेगी।
रोना हँसना साथ, घड़ी पावन छाएगी।।
कह सुधीर कविराय, यही जीवन का सावन।
हँसते रहिए आप, लुत्फ लेना है जीवन।।

सेवा अरु संकल्प का, होता है नित मान।
मन घमंड से दूर हो, इतना रखिए ध्यान।।
इतना रखिए ध्यान, इसी में अपना गौरव।
नहीं बनेंगे आप, कभी तब शकुनी कौरव।।
कह सुधीर कविराय, सदा ही खाओ मेवा।
मत कर अनुचित बात, करो तुम सबकी सेवा।।

तर्पण करते जा रहे,अपना बुद्धि विवेक।
हमको ऐसा लग रहा, काम बचा है एक।।
काम बचा है एक, बड़ी है उलझन हमको।
रोते जाते आज, याद हम करते तुमको।।
कह सुधीर कविराय, देखते हैं हम दर्पण।
आती सबकी याद, करें हम मन से तर्पण।।

साजन रहते दूर हैं, फिर भी लगते पास।
सजनी खातिर सजन ही, जीवन का विश्वास।।
जीवन का विश्वास, नहीं है दूजा कोई।
थामेगा जो हाथ, कहे किससे वो रोई।
खड़े बहुत है लोग, बोलते सब मनभावन।
उसके मन की चाह, दरश मिल जाए साजन।।

संगम तट पर आ गये, माँ गंगा के लाल।
धर्म सनातन हो गया, आज बहुत खुशहाल।।
आज बहुत खुशहाल, देख माँ गंगा माया।
जैसे सारा विश्व, उमड़ तट संगम आया।।
कह सुधीर कविराय, देख लो दृश्य विहंगम।
आप झुकाओ शीश, शीघ्र पहुंच कर संगम।।

हीरा मानव मन बने, आज यही दरकार।
मर्यादा के साथ ही, चलती कब सरकार।।
चलती कब सरकार, बाँटती खूब मलाई।
जनता भी खुशहाल, मुफ्त की खिचड़ी खाई।
नीति नियम से चलें, नहीं हो कोई पीरा।
देश बढ़े जब साथ, मगन मानव हीरा।।

आया स्वारथ दौर है, जान रहे हम आप।
होते जिसकी ओट में, तरह-तरह के पाप।।
तरह-तरह के पाप, शर्म है किसको आती।
जलती सुबहो-शाम, प्रेम से दीपक बाती।
बनी आज की रीति, समझ लो मेरे भाया।।
कलयुग चढ़कर शीश, झूमते गाते आया।।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112022906
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