अस्तित्व का द्वंद्व
एक कमरे में विनोद और वेदना के संग जीना कैसा होता है?
वर्षों तक एक ही जगह घुटते रहना... आखिर कैसा होता है?
आंतरिक उत्कर्ष के बिना, सामाजिक मूल्यों का बोझ ढोना कैसा होता है?
आदमी जब अभाव के उस चरम से गुजरता है,
जहाँ शौच तक के लिए 'पाँच रुपये' कम कराने की जद्दोजहद हो—
सोचो, वह दौर कैसा होता है?
सचमुच, बोध के बिना जीना कितना अजीब है!
मन में द्वंद्व है, विचलन है, जिज्ञासा है,
पर कहीं ठहराव नहीं; और हो भी, तो किसके आसरे?
जहाँ ठहराव है, वहाँ न वृद्धि है, न सत्य, न खोज,
मन बिना उद्देश्य बस भागता है... निरंतर भागता जाता है।
न इसे पदार्थ में चैन है, न कल्पनाओं में सुकून,
यह अंतहीन खोज की डगर पर बस चलते रहना चाहता है।
-कपिल तिवारी "यथार्थ"