इस ज़ीस्त के मरहले पे सब कुछ छूट रहा है,
हर साथ दिया चेहरा ख़ामोश रूठ रहा है।
कल तक जो मेरी राह का हमसफ़र बना था,
वो आज मेरी नज़रों से चुपचाप छूट रहा है।
थामा था जिसे दिल ने बड़ी शिद्दतों के साथ,
वो रिश्ता भी अब वक़्त के हाथों टूट रहा है।
आँखों में जो सपनों का इक शहर बसा था,
देखो वही हर मोड़ पे बिखर के छूट रहा है।
मैं खुद को संभालूँ कि इन हालात को थामूँ,
हर लम्हा मेरी मुट्ठी से फिसलता छूट रहा है।
किससे करूँ अब हाल-ए-दिल अपना बयाँ मैं,
अपना ही साया मुझसे कहीं दूर छूट रहा है।
- known stranger