कुछ अर्ज़ है किताबी,
कुछ फ़र्ज़ है ज़िंदगी,
चेहरा बदलती रहती है,
पर मर्ज़ है ये ज़िंदगी।।
कभी हँसी के पीछे सिसकती,
कभी खामोशी में चीखती है,
भीड़ में भी तन्हा कर दे,
अजीब-सी साज़िश है ये ज़िंदगी।।
ना मुकम्मल कोई दास्तां,
ना पूरा कोई सफ़र मिला,
हर रिश्ते के टूटने का,
बस एक इकरार है ज़िंदगी।।
नींदों से भी रिश्ता टूटा,
ख़्वाबों ने भी साथ छोड़ा,
आँखों के हर सूखे कोने में,
जमा एक दरिया है ज़िंदगी।।
कभी आईनों में खुद को ढूँढती,
कभी अपनी ही नज़रों से गिरती,
हर रोज़ नया चेहरा ओढ़े,
एक बेवफ़ा किरदार है ज़िंदगी।।
कभी वक़्त के हाथों बिकती,
कभी किस्मत से हारती हुई,
हर साँस पे बोझ रखे,
एक ख़ामोश उधार है ज़िंदगी।।
ArUu ✍️
कभी अपने ही ज़ख्म कुरेदे,
खुद पे ही वार है ये ज़िंदगी।।