"धकेली गई बूंद"
____________________________________________________
हल्की गिरती बूंदे
थामती है, हाथ बारिश का
मौसम ठंड से भरा
हल्की गर्मी में
एक बूंद की तरह
गुम हुआ जमीन की सतह पर।
नीचे गंदगी से भरी
नाली में बूंद काली
गुड़िया की तरह
लिखती है बारिश को खत।
पहले धूल
गैस के कण
फिर ऑक्सीजन के
पीछे हाइड्रोजन में घुलती
हुई वे पहुंची थी कोठे पर।
कितने कस्टमर
देखे उसने
कम उम्र में
बूंद काली मिर्च की तरह
सिकुड़ती गई दिन ब दिन।
रात के बादल को
घूरते हुए कमरे की
खिड़की से
चांद बेरुखा ही नजर आता रहा
घायल बूंद उसके कफ़न को
जानती थी।
काले आसमान में
सियाह चांद पर ओढ़े सफेद धब्बे
से कफ़न को बूंद ही
जानती थी।
तारों के अनंत सृजन
को उसने घटित होते हुए
अपनी कोमल नजरों से देखा था।
निर्माण का गीत
लिखने से पहले
बूंद का हिस्सा
बनाया गया था।
उसने अपने जन्मदाता को
पैनी मासूम भरी आंखों से
आखरी बार कब देखा
वह भूल गई।
वे बूढ़े इंसान को
प्यासे कुएं के
पास मंडराते हुए
जानती रही।
नाली के बाद
मरघट के सन्नाटे में
उसे मुर्दे के मुख में डाला गया।
डुबकी लगाने से पहले
मंत्र के हर अक्षर को
उसने सुना था।
अपने वजूद को इस तरह
नीलाम होते हुए भी
कोई अपराध उससे न बना।
एक सहमी नदी में मछुवारों
ने किसी मछली के पेट से
बूंद को निकाला।
बाहर आते ही
उसने डूबते सूरज को
गालियां नहीं दी।
उसकी बाहों में
दम तोड़ते पंछी की आखरी पुकार
उसने भी सुनी थी।
भाप बनते हुए
उसने पीछे मुड़कर देखा था
एक ही प्रार्थना उसने गाई
की फिर कभी वह नीले ग्रह का
कोई हिस्सा नहीं होना चाहती
उसे मिटाया जाए
किसी पेंसिल से बने वृत्ताकार चित्र की तरह।
भाप की हल्की देह में
घुलते हुए भी
उसने अपने पुराने घावों को
पूरी तरह छोड़ा नहीं था।
आसमान की ऊँचाई में
वह फिर से शुद्ध कही गई
जैसे पाप का कोई इतिहास
ऊपर चढ़ते ही मिट जाता हो।
लेकिन उसे याद था—
नाली की सड़ांध,
कोठे की सीलन,
और मरघट का ठंडा मौन।
बादलों की भीड़ में
वह अकेली ही रही
हर सफेद फाहे में
उसे किसी कफ़न की सिलवट दिखती थी।
हवा ने उसे सहलाया नहीं
बस धकेला
एक और जन्म की ओर।
फिर से गिरना था उसे—
किसी खेत में
किसी शहर में
या फिर किसी और बंद कमरे में
जहाँ खिड़की से दिखता चाँद
फिर वही बेरुखा चेहरा लिए खड़ा हो।
उसने एक क्षण को
खुद को रोकना चाहा
बिखर जाना चाहा
बादल के भीतर ही
किसी अधूरी स्मृति की तरह।
पर नियमों के आगे
प्रार्थनाएँ अक्सर छोटी पड़ जाती हैं।
गिरते हुए
उसने पहली बार
आसमान को गाली दी—
धीरे, बिना आवाज़ के।
नीचे
एक बच्चा अपनी हथेली फैलाए
बारिश को पकड़ने की कोशिश में था
वह उसकी त्वचा पर गिरी
और कुछ पल के लिए
उसे लगा
शायद इस बार
वह गंदी नहीं होगी।
पर हथेली भी
आखिरकार
उसी दुनिया का हिस्सा थी।
वह लुढ़की
रेखाओं के बीच से
जीवन रेखा, भाग्य रेखा,
सबको पार करती हुई
फिर जमीन पर आ मिली।
इस बार
नाली तक पहुँचने से पहले
उसने खुद को
धूल में रगड़ लिया
जैसे कोई स्मृति
जानबूझकर खुद को मिटाती हो।
सूरज ऊपर से हँस रहा था
उसे पता था
अंत क्या होगा।
और जब वह फिर से
भाप बनकर उठी
तो इस बार
उसने कोई प्रार्थना नहीं की।
सिर्फ एक खालीपन था—
इतना गहरा
कि उसमें
न तो जन्म बचा था
न मृत्यु।
बस एक वृत्त था
जिसे कोई मिटा नहीं रहा था
और वह बार-बार
उसी पर खींची जा रही थी।
_____________________________________________