Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

Poem quotes are very popular on BitesApp with millions of authors writing small inspirational quotes in Hindi daily and inspiring the readers, you can start writing today and fulfill your life of becoming the quotes writer or poem writer.

"भंग"
____________________________________________________

मैं तबतक निश्चित नहीं हु
जबतक कोई मुझे देख नहीं लेता।

ब्रह्मांड में फैली मटमैली हवाओं
की धूल में बिखरा कोई बादल
उसने अपनी खोज खुद ही की हैं।

बदलाव में बदलते रहना ही
नियति थी
उन सबकी जिनकी धारणा में
कोई निवारण नहीं रहा।

शरद ऋतु
हर साल भड़कती है
उसने अपनी कहानी किसी
को नहीं बताई
कौन बेखबर सुने
किसी और की पीड़ाओं से भरी कविता।

मैं बदलता नहीं हु
ये भी तो संभावना है
स्थिरता अपने आप में
सबकुछ बदल देती है।

सौरमंडल में घूमता
अजीब कण
सिमटकर बिखरता है
उसकी कोई प्यास या भूख भी होगी
या होगा उसके पास पीला राशनकार्ड
कतार में खड़े कणों में
ऊबता हुआ मैं।

अभी मुझे पता नहीं है
कि बढ़ती हुई
आंखे नीली गहरी
गहरी सांस छोड़ते हुए
देखती है
ढकते सूरज को।

अनंत में किसी एक ने
कहा था कि
उसने जान लिया
लेकिन जानकारी किसी के साथ
साझा करने में उसकी हिचक बीमारी की तरह
उसके सीने में बैठी रही।

अनिश्चित काल से
सियाह शून्य के अंधकार में
हिलता हुआ खुद को ही देखता रहा
कभी अरबों साल पहले
ही मैंने डायरी लिखना क्यों बंद कर दिया।

चींटी निर्बुद्ध प्राणी है
ब्रह्मांड के कण सा
उसका अपना कोई स्वत्त्व नहीं
ये भी अलग तरह की भावना में
डूबना नहीं तो क्या है।

उसके साथ होते हुए भी
मैं अलिप्त रहता हु
किसी परमाणु की तरह
फिसलना मेरी उम्र रही।

वहां क्या था
जहां सबने देखा
किसको दुखी कण नजर आया।

शायद
देखना भी एक भ्रम था
और देखे जाना
उससे भी गहरी साज़िश—
जहाँ आंखें नहीं
सिर्फ़ प्रकाश का संदेह था
और मैं
उस संदेह के किनारे बैठा
अपना चेहरा टटोलता रहा।

किसी ने पुकारा नहीं
फिर भी
ध्वनि की एक आदत
मेरे भीतर गूंजती रही
जैसे कोई पुराना नाम
जिसे अब कोई नहीं जानता।

समय ने
अपने ही वृत्त को काटकर
एक सीधी रेखा बनने की कोशिश की
और वहीं टूट गया—
वहीं
मैंने पहली बार
“पहले” और “बाद” के बीच
कोई अंतर नहीं पाया।

एक कण था
जो मुझसे छूटकर
किसी और की स्मृति में चला गया
वहां उसने खुद को
इतिहास कहा—
और मैं
वर्तमान की तरह
हर क्षण मिटता रहा।

नींद
शायद सबसे पुरानी भाषा थी
जिसमें
बिना बोले
सब कुछ कहा जा सकता था
पर मैं जागता रहा
जैसे कोई अधूरी पंक्ति
जिसे लिखने वाला
कभी लौटा ही नहीं।

तुमने कहा था—
“जानना” एक अंत है
लेकिन मैंने देखा
हर उत्तर के भीतर
एक और प्रश्न की हड्डी छिपी होती है
जिसे चबाते-चबाते
विचार खून में बदल जाते हैं।

अब
जब कोई नहीं देख रहा
मैं थोड़ा-सा निश्चित हूँ—
या शायद
यह भी वही क्षण है
जब कोई
कहीं से
मुझे देख रहा है।

और यदि
देखे जाने और न देखे जाने के बीच
कोई तीसरी जगह है—
तो मैं वहीं हूँ
एक अधूरी उपस्थिति की तरह
जो
होने और न होने के बीच
धीरे-धीरे
अपना अर्थ खोती जा रही है।

भंग होते हुए
अपनी अभंग छाया को
मैं पूछता हु
किसने देखा है
उसे जिसका कोई वजूद ही नहीं।

वजूद में न होना ही
यहां धूल पर लिखना है
कि कोई नहीं है
वापस लौट जाओ।
_________________________________________

Hindi Poem by Anup Gajare : 112019320
New bites

The best sellers write on Matrubharti, do you?

Start Writing Now