Hindi Quote in Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

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ऋगुवेद सूक्ति--(३६) की व्याख्या
"मा नः प्रजा रीरिषः”
ऋगुवेद--१०/१८/१
अर्थ-- हे प्रभु ! तू हमारी सन्तानों को नष्ट न कर।
शब्दार्थ--
मा = मत / नहीं
नः = हमारी
प्रजा = सन्तान, लोग, जनता
रीरिषः = हानि करना, नष्ट करना, पीड़ा देना
भावार्थ--
“हमारी प्रजा को हानि मत पहुँचाओ।”
या
“हमारी सन्तान/जनता का नाश न हो।”
विस्तृत अर्थ--
ऋग्वेद में यह प्रार्थना देवता से की जाती है कि हमारी प्रजा, परिवार और समाज सुरक्षित रहें, उन्हें किसी प्रकार की हानि, विनाश या दुःख न हो।
अर्थात यह मंत्र लोककल्याण, सुरक्षा और प्रजा की रक्षा की भावना को व्यक्त करता है।
“मा नः प्रजा रीरिषः” का भाव हमारी प्रजा को हानि न हो — यह विचार वेदों में अनेक स्थानों पर मिलता है। वेदों में प्रजा की रक्षा, कल्याण और वृद्धि की प्रार्थना बार-बार की गयी है।
१.ऋगुवेद--
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं
मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्।
मा नो वधीः पितरं मोत मातरं
मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः॥ (ऋग्वेद 1.114.8)
भावार्थ — हे रुद्र! हमारे बड़े-छोटे, बालक-युवक, माता-पिता और प्रिय जनों को हानि मत पहुँचाओ।
२- यजुर्वेद --
मा हिंसीः पुरुषं जगत्।
भावार्थ — मनुष्य और संसार के प्राणियों को हिंसा न करो।
३ अथर्ववेद --
भद्रं नो अपि वातय मनः।
भावार्थ — हमारा मन और जीवन कल्याणकारी बने।
४. ऋग्वेद--
शं नो मित्रः शं वरुणः
शं नो भवत्वर्यमा।
भावार्थ — मित्र, वरुण आदि देवता हमारे लिए कल्याणकारी हों और हमें सुख-शांति दें।
सार--
वेदों में अनेक मंत्रों के माध्यम से यह सिद्ध होता है कि प्रजा की रक्षा,अहिंसा,लोककल्याण
सभी के सुख की कामना
वेदों की मूल भावना है।
“मा नः प्रजा रीरिषः” भी इसी वेदिक भावना को प्रकट करता है कि हमारी प्रजा, सन्तान और समाज को कोई हानि न पहुँचे। है। वेदों की तरह उपनिषदों में भी प्रजा-रक्षा, अहिंसा, और सबके कल्याण की भावना के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
उपनिषद् में प्रमाण--
१. ईश उपनिषद--
“यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”
भावार्थ — जो मनुष्य सभी प्राणियों को अपने ही आत्मा में और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा या हानि नहीं करता।
२- छान्दोग्य उपनिषद--
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।”
भावार्थ — यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है। इसलिए किसी प्राणी को कष्ट पहुँचाना उचित नहीं।
३. तैत्तिरीय उपनिषद --
“मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।”
भावार्थ — माता, पिता, गुरु और अतिथि का सम्मान और संरक्षण करो।
४. बृहदारण्यक उपनिषद --
“असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय।”
भावार्थ — हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।
५ कठ उपनिषद--
“एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति।”
भावार्थ — एक ही परमात्मा सब प्राणियों के भीतर स्थित है और वही अनेक रूपों में प्रकट होता है। इसलिए किसी प्राणी को हानि पहुँचाना उचित नहीं।
६-मुण्डक‌ उपनिषद--
“यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।”
भावार्थ — ज्ञानी पुरुष के लिए सभी प्राणी अपने ही समान हो जाते हैं; इसलिए वह किसी को कष्ट नहीं देता।
७. श्वेताश्वतर उपनिषद--
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।”
भावार्थ — एक ही परमात्मा सभी प्राणियों में भीतर स्थित है और सबमें व्याप्त है।
८. मैत्री उपनिषद--
“आत्मवत् सर्वभूतेषु।”
भावार्थ — सभी प्राणियों को अपने समान समझो।
सार--
इन उपनिषदों से यह सिद्ध होता है कि सभी प्राणियों में एक ही आत्मा और परमात्मा का वास है।
इसलिए किसी प्राणी को हानि पहुँचाना धर्म के विरुद्ध है।
सभी के कल्याण और संरक्षण की भावना ही श्रेष्ठ आचरण है।
इसी कारण वेद का वाक्य “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) उपनिषदों की शिक्षाओं के साथ पूर्णतः संगत है। खाता है।
पुराणों में प्रमाण--
१. भागवत पुराण--
“सर्वभूतहिते रतः।”
भावार्थ — श्रेष्ठ मनुष्य वह है जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
२. विष्णु पुराण--
“परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।”
भावार्थ — दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है।
३. पद्म पुराण --
“अहिंसा परमो धर्मः।”
भावार्थ — अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है।
४. गरुड़ पूराण-
“न हिंस्यात् सर्वभूतानि।”
भावार्थ — किसी भी प्राणी को कष्ट या हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।
५- स्कंद पुराण --
“न हिंस्यात् सर्वभूतानि सर्वभूतहिते रतः।”
भावार्थ — किसी भी प्राणी को कष्ट न दे और सभी प्राणियों के हित में लगा रहे।
६. अग्नि पुराण--
“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।”
भावार्थ — अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियों का संयम — ये धर्म के मुख्य लक्षण हैं।
७. ब्रह्म पुराण--
“सर्वभूतदयायुक्तः स धर्मं वेत्ति पण्डितः।”
भावार्थ — जो सभी प्राणियों पर दया करता है वही सच्चे धर्म को जानने वाला पण्डित है।
८. नारद‌ पुराण--
“दया सर्वभूतेषु धर्मस्य परमं फलम्।”
भावार्थ — सभी प्राणियों पर दया करना धर्म का सर्वोच्च फल है।
सार--
इन पुराणों से यह सिद्ध होता है कि सभी प्राणियों पर दया करना धर्म है।
किसी को कष्ट देना अधर्म है।
लोक-कल्याण और प्रजा-रक्षा ही श्रेष्ठ आचरण है।
भगवद्गीता में प्रमाण--
१- अध्याय १२, श्लोक १३
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।”
भावार्थ — जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता और सबके प्रति मित्रभाव तथा करुणा रखता है, वही श्रेष्ठ भक्त है।
२. अध्याय ५ श्लोक २५
“लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥”
भावार्थ — जिनका मन शुद्ध है और जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होते हैं।
३-अध्याय ६ श्लोक ३२
“आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥”
भावार्थ — जो दूसरों के सुख-दुःख को अपने समान समझता है, वही श्रेष्ठ योगी है।
४- अध्याय १६, श्लोक २
“अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।”
भावार्थ — अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग और शान्ति — ये दैवी गुण हैं।
सार--
गीता में स्पष्ट बताया गया है कि—
सभी प्राणियों से द्वेष न करना
सर्वभूत हित में लगे रहना
अहिंसा और करुणा रखना
ये श्रेष्ठ धर्म और योग के लक्षण हैं।
महाभारत में प्रमाण--
१-अनुशासन पर्व-
“अहिंसा परमो धर्मः।”
भावार्थ — अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है।
२-शान्ति पर्व
“न हिंस्यात् सर्वभूतानि।”
भावार्थ — किसी भी प्राणी को कष्ट या हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।
३-अनुशासन पर्व-
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”
भावार्थ — जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
४-शान्ति पर्व--
“सर्वभूतहिते युक्तः स धर्मं वेत्ति पाण्डव।”
भावार्थ — भीष्म पितामह युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए कहते हैं कि‌ से पाण्डव ! जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है वही सच्चे धर्म को जानता है।
सार--
महाभारत में स्पष्ट बताया गया है कि—अहिंसा सर्वोच्च धर्म है।
किसी भी प्राणी को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।
दूसरों के हित और प्रजा की रक्षा करना ही धर्म है।
इस प्रकार वेद का सिद्धान्त “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) की भावना महाभारत में भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।
स्मृति ग्रन्थों प्रमाण --
१.मनु स्मृति --
“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥” (मनुस्मृति १०-६३)
भावार्थ — अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियों का संयम — यह सबके लिए समान धर्म है।
२. याज्ञवल्क्य स्मृति--
“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।”
भावार्थ — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह धर्म के मुख्य लक्षण हैं।
३- पराशर स्मृति--
“न हिंस्यात् सर्वभूतानि।”
भावार्थ — किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देना चाहिए।
४--नारद स्मृति --
“दया सर्वभूतेषु धर्मस्य परमं लक्षणम्।”
भावार्थ — सभी प्राणियों पर दया करना धर्म का सर्वोच्च लक्षण है।
सार--
स्मृति ग्रन्थों की शिक्षा यह बताती है कि—अहिंसा धर्म का मुख्य सिद्धान्त है।
सभी प्राणियों पर दया करना चाहिए। किसी को हानि पहुँचाना अधर्म है।
इस प्रकार वेद का सिद्धान्त “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) की भावना स्मृति ग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से समर्थित मिलती है।नीति-शास्त्रों में भी सर्वभूत-हित, दया और किसी को कष्ट न देने का सिद्धान्त स्पष्ट रूप से बताया गया है।
१- चाणक्य नीति --
“मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥”
भावार्थ — जो दूसरों की स्त्री को माता के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के समान और सभी प्राणियों को अपने समान समझता है, वही सच्चा पण्डित है।
२. विदुर नीति-- (महाभारत)
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”
भावार्थ — जो व्यवहार अपने लिए अच्छा न लगे, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
३- शुक्र नीति --
“दया सर्वभूतेषु कर्तव्या।”
भावार्थ — सभी प्राणियों पर दया करना मनुष्य का कर्तव्य है।
४- भरथरी नीति शतक--
“परोपकाराय सतां विभूतयः।”
भावार्थ — सज्जनों की सम्पत्ति और शक्ति दूसरों के उपकार के लिए होती है।
सार--
नीति-शास्त्रों में स्पष्ट बताया गया है कि—सभी प्राणियों को अपने समान समझना चाहिए।
दूसरों को कष्ट देना अधर्म है।
परोपकार और सर्वभूत-हित ही श्रेष्ठ नीति है।
इस प्रकार वेद का सिद्धान्त “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) की भावना नीति-शास्त्रों में भी पूर्ण रूप से समर्थित मिलती है।
१-वाल्मीकि रामायण में प्रमाण-
“सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥”
(युद्धकाण्ड 18.33)
भावार्थ — जो एक बार भी शरण में आकर कहे कि “मैं आपका हूँ”, उसे मैं सभी प्राणियों से अभय देता हूँ। यह मेरा व्रत है।
यहाँ भगवान राम सभी प्राणियों की रक्षा और अहिंसा की भावना व्यक्त करते हैं।
२-अध्यात्म रामायण में प्रमाण-
“सर्वभूतहिते रतः।”
भावार्थ — श्रेष्ठ पुरुष वही है जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
3. गर्ग संहिता में प्रमाण -
“दयालुः सर्वभूतेषु।”
भावार्थ — महापुरुष वह है जो सभी प्राणियों पर दया करने वाला हो।
सार--
इन ग्रन्थों में स्पष्ट बताया गया है कि—
सभी प्राणियों को अभय देना
सर्वभूत-हित में लगे रहना
सब पर दया करना
धर्म का मुख्य सिद्धान्त है।
इस प्रकार वेद का वाक्य “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) की भावना रामायण, अध्यात्म रामायण और गर्ग संहिता में भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित होती है।
योग वशिष्ठ में प्रमाण-
१. सर्वभूत-हित का सिद्धान्त
“सर्वभूतहिते रतः साधवो हि महात्मानः।”
— योग वशिष्ठ
अर्थ:
महात्मा और सज्जन लोग सदा सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।
२. समदृष्टि और अहिंसा
“यथा स्वे तथा सर्वेषु भूतेषु दयया स्थितिः।”
— योग वशिष्ठ
अर्थ:
जैसा अपने प्रति भाव हो, वैसा ही सभी प्राणियों के प्रति दया और समान दृष्टि रखनी चाहिए।
३. करुणा और धर्म
“परोपकाराय सतां विभूतयः।”
— योग वशिष्ठ (प्रचलित उक्ति)
अर्थ:
सज्जनों की सम्पत्ति और सामर्थ्य परोपकार के लिए ही होती है।
इन कथनों का मुख्य संदेश यह है कि सच्चा ज्ञानी वही है जो आत्मज्ञान के साथ-साथ सभी प्राणियों के हित, दया और समता का पालन करे।
इसीलिए योग वशिष्ठ में बार-बार बताया गया है कि आत्मज्ञान का फल करुणा, अहिंसा और सर्वभूत-हित है।
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Hindi Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) : 112018653
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