ऋगुवेद सूक्ति--(३३) की व्याख्या
"विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि"
भावार्थ --हे प्रभु! सारी विद्याओं का आदि मूल तू ही है।
मंत्र —
विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि--2.23.2
पदच्छेद-
विश्वेषाम् + इत् + जनिता + ब्रह्मणाम् + असि
शब्दार्थ--
विश्वेषाम् — सबका, समस्त का
इद् — ही, निश्चय ही
जनिता — उत्पन्न करने वाला, जन्मदाता
ब्रह्मणाम् — ब्रह्म (ज्ञान, मन्त्र, विद्या) का
असि — तुम हो
भावार्थ--
हे प्रभु! आप ही समस्त ब्रह्म (ज्ञान, मन्त्र और विद्याओं) के उत्पन्न करने वाले हैं। संसार में जो भी विद्या, ज्ञान या सत्य का प्रकाश है, उसका मूल स्रोत आप ही हैं।
अर्थात् — सभी विद्याओं का आदि मूल परमात्मा ही है।
व्याख्या--
इस मंत्र में यह सिद्ध किया गया है कि ज्ञान स्वतः नहीं उत्पन्न होता, बल्कि उसका परम स्रोत परमात्मा है। वही परम चेतना ऋषियों के हृदय में ज्ञान का प्रकाश करती है, जिससे वेद, मंत्र और समस्त विद्याएँ प्रकट होती हैं।
इस प्रकार यह मंत्र बताता है कि परमात्मा ही समस्त ज्ञान का मूल कारण और प्रेरक है।
वेदों में प्रमाण --
1. ऋग्वेद-- 10.71.1
बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं
यत्प्रैरत नामधेयं दधानाः।
अर्थ :
हे बृहस्पति (परमेश्वर)! आपने ही प्रारम्भ में वाणी और ज्ञान को प्रकट किया और वस्तुओं के नाम तथा विद्या का ज्ञान दिया।
भाव :
ज्ञान और वाणी का मूल स्रोत परमात्मा है।
2. यजुर्वेद-- 40.8
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्
अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः
याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥
अर्थ :
वह परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और स्वयम्भू है; वही यथार्थ रूप से सब पदार्थों का ज्ञान मनुष्यों को देता है।
भाव :
सभी ज्ञान का विधान और व्यवस्था परमात्मा ही करता है।
3. ऋग्वेद-- 10.129.6
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्
सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद।
अर्थ :
इस सृष्टि का जो परम अधीक्षक परम आकाश में स्थित है, वही वास्तव में सबको जानता है।
भाव :
सर्वज्ञ परमात्मा ही ज्ञान का परम आधार है।
4. अथर्ववेद --10.8.32
येन ऋचः साम यजूंषि निर्मितानि।
अर्थ :
जिस परमात्मा से ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मंत्र प्रकट हुए हैं।
भाव :
वेद और समस्त विद्या का मूल परमात्मा है।
निष्कर्ष :
वेदों में अनेक स्थानों पर यह सिद्ध किया गया है कि समस्त ज्ञान, वाणी, वेद और विद्याओं का मूल स्रोत परमात्मा ही है।
उपनिषदों में प्रमाण---
1. मुण्डकोपनिषद --1.1.1
श्लोक :
ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव
विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्
अथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह॥
अर्थ :
सृष्टि के कर्ता ब्रह्मा ने सबसे पहले ब्रह्मविद्या, जो सभी विद्याओं की आधार है, अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को बताई।
भाव :
यह बताता है कि सभी विद्याओं का मूल आधार परमात्मा से प्राप्त ब्रह्मविद्या है।
2--कठ उपनिषद् --2.2.15
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
अर्थ :
जहाँ परमात्मा का प्रकाश है वहाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि भी प्रकाश नहीं देते; उसी के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित होता है।
भाव :
सारा ज्ञान और प्रकाश उसी परमात्मा से प्राप्त होता है।
3. श्वेताश्वतर उपनिषद-- 6.18
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥
अर्थ :
जो परमात्मा पहले ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और वही उन्हें वेदों का ज्ञान देता है — उस आत्मबुद्धि को प्रकाशित करने वाले देव की मैं शरण लेता हूँ।
भाव :
वेदों और ज्ञान का उपदेश भी परमात्मा ही करता है।
4.तैत्तिरीय उपनिषद--2.1
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।
अर्थ :
ब्रह्म (परमात्मा) सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है।
भाव :
ज्ञान स्वयं परमात्मा का स्वरूप है, इसलिए सारी विद्या का मूल भी वही है।
5. बृहदारण्यक उपनिषद्-- 2.4.10
अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो
यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः।
अर्थ :
यह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद उस महान् परमात्मा के निःश्वास (श्वास) के समान हैं।
भाव :
वेद और ज्ञान का उद्गम परमात्मा से ही है।
6. छान्दोग्य उपनिषद्-- 6.1.3
येनाश्रुतं श्रुतं भवति
अमतं मतम् अविज्ञातं विज्ञातम्।
अर्थ :
जिस ज्ञान को जान लेने से अश्रुत भी श्रुत हो जाता है, और अज्ञात भी ज्ञात हो जाता है।
भाव :
परमात्मा का ज्ञान ही सभी ज्ञानों का मूल है।
7-- प्रश्न उपनिषद् --6.3
स प्राणमसृजत।
अर्थ :
परमात्मा ने ही प्राण आदि की रचना की।
भाव :
सृष्टि और जीवन के साथ-साथ ज्ञान का मूल कारण भी वही परमात्मा है।
8. एतरेय उपनिषद् --3.3
प्रज्ञानं ब्रह्म।
अर्थ :
प्रज्ञान (परम ज्ञान) ही ब्रह्म है।
भाव :
परमात्मा ही परम ज्ञानस्वरूप है, इसलिए सभी विद्याओं का मूल वही है।
पुराणों में प्रमाण---
1. विष्णु पुराण --1.2.10
ज्ञानस्वरूपो भगवान् विष्णुः।
अर्थ :
भगवान विष्णु स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं।
भाव :
समस्त ज्ञान और विद्या का मूल भगवान ही हैं।
2. भागवत पुराण-- 1.1.1
श्लोक :
तेने ब्रह्म हृदा या आदिकवये।
अर्थ :
भगवान ने सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के हृदय में वेदज्ञान का प्रकाश किया।
भाव :
वेद और समस्त विद्या का ज्ञान परमात्मा से ही प्राप्त होता है।
3. शिव पुराण --(विद्येश्वर संहिता)
ज्ञानं महेश्वरादेव सर्वविद्या प्रवर्तते।
अर्थ :
समस्त विद्या और ज्ञान महेश्वर से ही प्रवाहित होते हैं।
भाव :
सभी विद्याओं का मूल परमेश्वर है।
4 --ब्रह्म पुराण--
ईश्वरः सर्वविद्यानां मूलभूतः सनातनः।
अर्थ :
सनातन ईश्वर ही सभी विद्याओं का मूल कारण है।
5--पद्म पुराण --
सर्वज्ञानमयो देवः सर्वविद्याप्रवर्तकः।
अर्थ :
परमेश्वर सर्वज्ञानमय हैं और वही सभी विद्याओं को प्रवर्तित करने वाले हैं।
भाव :
समस्त ज्ञान और विद्या का मूल परमात्मा ही है।
6 स्कंद पुराण--
ज्ञानं विज्ञानसहितं देवात् सर्वं प्रवर्तते।
अर्थ :
ज्ञान और विज्ञान सहित सभी विद्याएँ परम देव से ही उत्पन्न होती हैं।
7.नारद पुराण--
सर्वविद्यानां प्रभुः देवो ज्ञानप्रदः सनातनः।
अर्थ :
सनातन परमेश्वर ही सभी विद्याओं के स्वामी और ज्ञान देने वाले हैं।
4. गरुड़ पूराण-
ईश्वरात् सर्वविद्यानां उत्पत्तिः परिकीर्तिता।
अर्थ :
सभी विद्याओं की उत्पत्ति ईश्वर से ही बताई गई है।
निष्कर्ष :
पुराणों में भी यही सिद्ध किया गया है कि ज्ञान, वेद, विद्या और विज्ञान का मूल कारण परमात्मा ही है।
1.(क) भगवद्गीता-- 15.15
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
अर्थ :
मैं सबके हृदय में स्थित हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और बुद्धि उत्पन्न होती है।
भाव :
सभी प्रकार का ज्ञान परमात्मा से ही प्राप्त होता है।
1(ख) भगवद्गीता- 10.32
अध्यात्मविद्या विद्यानां।
अर्थ :
विद्याओं में मैं अध्यात्मविद्या हूँ।
भाव :
समस्त विद्याओं का मूल परमात्मा से संबंधित अध्यात्म ज्ञान है।
1(ग). भगवद्गीता-- 10.8
अहं सर्वस्य प्रभवो
मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
अर्थ :
मैं ही सबका मूल कारण हूँ और सब कुछ मुझसे ही प्रवर्तित होता है।
भाव :
ज्ञान, विद्या और सृष्टि सबका मूल परमात्मा है।
1(घ). भगवद्गीता-- 7.10
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि।
अर्थ :
मैं बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ।
भाव :
सभी बुद्धि और ज्ञान का आधार परमात्मा ही है।
निष्कर्ष :
गीता में भी स्पष्ट कहा गया है कि ज्ञान, स्मृति, बुद्धि और समस्त विद्याओं का मूल परमात्मा ही है।
महाभारत में प्रमाण -
1- (शान्ति पर्व)
ज्ञानं हि परमं ब्रह्म।
अर्थ :
ज्ञान ही परम ब्रह्म का स्वरूप है।
भाव :
परमात्मा ही ज्ञानस्वरूप है, इसलिए समस्त विद्या का मूल वही है।
2. (शान्ति पर्व)
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
अर्थ :
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है।
भाव :
ज्ञान सर्वोच्च है और उसका मूल परमात्मा है।
3. (अनुशासन पर्व)
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे तिष्ठति।
अर्थ :
ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।
भाव :
हृदय में स्थित परमात्मा ही मनुष्य को ज्ञान और बुद्धि प्रदान करता है।
4. (शान्ति पर्व)
सर्वविद्यानां प्रभुः देवः।
अर्थ :
परम देव ही सभी विद्याओं के स्वामी हैं।
निष्कर्ष :
महाभारत में भी यह सिद्ध किया गया है कि ज्ञान, बुद्धि और सभी विद्याओं का मूल स्रोत परमात्मा ही है।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
1(क). मनु स्मृति--1.21
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।
वेदशब्देभ्य एवेदौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥
अर्थ :
परमात्मा ने वेदों के शब्दों से ही सब वस्तुओं के नाम, कर्म और व्यवस्थाएँ स्थापित कीं।
भाव :
सारी व्यवस्था और ज्ञान का मूल वेद है, और वेद परमात्मा से प्रकट हुए हैं।
1(ख)-मनु स्मृति-- 2.6
वेदोऽखिलो धर्ममूलम्।
अर्थ :
सम्पूर्ण वेद ही धर्म का मूल है।
भाव :
वेदों में ही सभी ज्ञान और धर्म का आधार है।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.3
वेदो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
अर्थ :
वेद धर्म का मूल हैं और स्मृतियाँ तथा श्रेष्ठ आचरण उसी के आधार पर हैं।
भाव :
सभी ज्ञान और नियमों का मूल वेद है।
3--पराशर स्मृति--
वेदप्रणिहितो धर्मः।
अर्थ :
धर्म वेदों में स्थापित किया गया है।
भाव :
वेदों में ही जीवन का ज्ञान और मार्ग बताया गया है।
निष्कर्ष :
स्मृति ग्रन्थों में भी स्पष्ट कहा गया है कि वेद ही ज्ञान और धर्म का मूल हैं, और वेद परमात्मा से प्रकट हुए हैं। इसलिए समस्त विद्याओं का मूल परमात्मा है।
1.चाणक्य नीति--1-3
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥
अर्थ :
विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप है और छिपा हुआ धन है। वही सुख, यश और सम्मान देने वाली है तथा गुरुओं की भी गुरु है।
भृतहरि नीति शतक-- 20
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥
अर्थ :
विद्या मनुष्य का सर्वोत्तम रूप और छिपा हुआ धन है; वही सुख, यश और प्रतिष्ठा देने वाली है।
भाव :
विद्या ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।
3. विदुर नीति (महाभारत, उद्योगपर्व 33.37)
नास्ति विद्यासमं चक्षुः
नास्ति सत्यसमं तपः।
अर्थ :
विद्या के समान कोई नेत्र नहीं और सत्य के समान कोई तप नहीं है।
भाव :
विद्या मनुष्य को सही मार्ग दिखाने वाली है।
4-भृतहरि नीति शतक - 16
विद्या मित्रं प्रवासेषु
भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं
धर्मो मित्रं मृतस्य च॥
अर्थ :
विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि होती है और मरने के बाद धर्म मित्र होता है।
भाव :
विद्या जीवन के हर स्थान पर सहायक है।
निष्कर्ष :
चाणक्य नीति, भृतहरि नीति शतक-- और विदुर नीति जैसे नीति ग्रन्थों में भी विद्या को मनुष्य का सर्वोच्च धन और मार्गदर्शक बताया गया है। यह सिद्ध करता है कि ज्ञान और विद्या का महत्व सर्वोपरि है।
1. हितोपदेश-- 1.3
विद्या ददाति विनयं
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति
धनात् धर्मं ततः सुखम्॥
अर्थ :
विद्या से विनय (नम्रता) आती है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है।
भाव :
विद्या ही जीवन के सभी गुणों और सुखों का मूल है।
2. पन्चतन्त--
विद्या मित्रं प्रवासेषु
भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं
धर्मो मित्रं मृतस्य च॥
अर्थ :
विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि होती है और मृत्यु के बाद धर्म ही मित्र होता है।
भाव :
विद्या जीवन में हर स्थान पर सहायक होती है।
3. शुभाषित रत्न भण्डार-86
न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
अर्थ :
विद्या का धन ऐसा है जिसे न चोर चुरा सकते हैं, न राजा छीन सकता है, न भाई बाँट सकते हैं और न यह बोझ बनता है; खर्च करने पर भी यह बढ़ता ही है।
भाव :
विद्या सभी धनों में श्रेष्ठ है।
4. चाणक्य नीति-- 4.14
विद्याविहीनः पशुः।
अर्थ :
विद्या के बिना मनुष्य पशु के समान है।
भाव :
विद्या मनुष्य को वास्तविक मनुष्य बनाती है।
1. वाल्मीकि रामायण(बालकाण्ड 1.1.18)
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः।
अर्थ :
श्रीराम वेद और वेदांगों के तत्त्व को जानने वाले तथा धनुर्वेद में भी पूर्ण निपुण थे।
भाव :
वेद और उनकी विद्या को परम और दिव्य ज्ञान माना गया है।
2. वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड 1.1.20)
श्लोक :
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान्।
अर्थ :
वे सभी शास्त्रों के तत्त्व को जानने वाले, स्मरणशक्ति वाले और प्रतिभाशाली थे।
भाव :
सभी शास्त्रों का ज्ञान दिव्य ज्ञान माना गया है।
3. गर्ग संहिता (ज्ञान-महिमा प्रसंग)
ज्ञानं परं ब्रह्म सर्वविद्याप्रकाशकम्।
अर्थ :
परम ज्ञान ही ब्रह्म है और वही सभी विद्याओं को प्रकाशित करता है।
भाव :
सभी विद्याओं का मूल ब्रह्म (परमात्मा) है।
4. गर्ग संहिता --
ईश्वरः सर्वविद्यानां मूलं ज्ञानप्रदायकः।
अर्थ :
ईश्वर ही सभी विद्याओं का मूल और ज्ञान देने वाला है।
निष्कर्ष :
दोनों में यह बताया गया है कि वेद, शास्त्र और समस्त विद्या का आधार दिव्य ज्ञान है, और उसका अंतिम स्रोत परमात्मा ही है।
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