वे स्त्रियाँ...
जो रह गईं बस इतनी-सी आकांक्षा में
कि कभी रोटी की भाप के साथ
उनकी मेहनत की भी कोई गर्म-सी प्रशंसा उठे..
उन्हें कोई प्रशस्ति-पत्र नहीं मिला |
जो स्त्रियाँ...
आजीवन सजाती-सँवारती रहीं
घर के कोने,
धूप की तरह फैलती रहीं आँगन-आँगन..
उनके लिए कभी कोई महफ़िल नहीं सजी |
जिन स्त्रियों ने...
सुबह की पहली किरण से
शाम की बुझती लौ तक
अपनों के पीछे भागते हुए
अपने बदन को पसीने से चमकाया
उनकी हथेलियों तक
कभी तमगों की चमक नहीं पहुँची |
जिनका अस्तित्व धीरे-धीरे डूब गया
किसी और के नाम के पीछे
जैसे नदी...
समुद्र में अपना नाम खो देती है..
उनका नाम..
कभी किसी पोस्टर की शोभा नहीं बना |
जिन्होंने...
जरा सी अहमियत को ही
उपलब्धि मान लिया
वे रह गईं एक विकल्प की तरह,
कभी किसी की अनिवार्य आवश्यकता नहीं बनीं
क्योकि...
उनके हिस्से नहीं आए
कोई उपलब्धि, कोई तमगा,
कोई महफ़िल, कोई किताब, कोई ख़िताब
इसलिए उनके हिस्से नहीं आया
कोई दिवस, कोई उत्सव
वे बस कहलाती रहीं..
नाकारा, कामचोर, असफल स्त्रियाँ
उनके हिस्से आए...
कुछ तिरछे वाक्य...
“तुमने किया ही क्या?”
“तुम करती ही क्या हो?”
“तुम कुछ नहीं जानती…”
तो प्यारी स्त्री ..!
अगर तुम नहीं कहलाई
कामकाजी और सफल स्त्री
एक दिन अपनों से ही
हर जगह दुत्कार पाओगी |
सच कहती हूँ, सखी!
मरने से पहले ही
मार दी जाओगी |
~रिंकी सिंह
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