Hindi Quote in Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

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स्तोतुर्मघवन काममा पृण।
ऋगुवेद सूक्ति-- (३२) की व्याख्या
१/५७/५
भावार्थ --हे प्रभु! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो।
मंत्र :
“स्तोतुर्मघवन् काममापृण।”
— ऋगुवेद --1.57.5
पदच्छेद--
स्तोतुः / स्तोतुर् — स्तुति करने वाले, भक्त या उपासक का
मघवन् — दानी, कृपालु (इन्द्र अथवा परम दाता ईश्वर के लिए प्रयुक्त)
कामम् — इच्छा, अभिलाषा
आ पृण — पूर्ण करो, भर दो, संतुष्ट करो।
भावार्थ-
हे मघवन (दानी प्रभु)! जो भक्त आपकी स्तुति करता है, उसकी उचित और धर्मसम्मत कामनाओं को पूर्ण करो।
इस मंत्र में वेद यह शिक्षा देता है कि ईश्वर दानी और कृपालु है। जो व्यक्ति श्रद्धा, स्तुति और सत्कर्म के साथ ईश्वर की उपासना करता है, उसकी आवश्यक और धर्मयुक्त इच्छाओं को ईश्वर पूर्ण करता है।
यहाँ “मघवन्” शब्द विशेष रूप से उस परम शक्ति के लिए है जो दया, दान और कृपा से जीवों का पालन करती है।
भक्त जब ईश्वर का गुणगान करता है, तो उसका मन शुद्ध होता है और उसकी इच्छाएँ भी स्वार्थ से हटकर कल्याणकारी बन जाती हैं। ऐसी शुद्ध कामनाओं की पूर्ति ईश्वर की कृपा से होती है।
सारांश--
यह मंत्र सिखाता है कि भक्तिपूर्वक ईश्वर की स्तुति करने वाला व्यक्ति अपनी धर्मयुक्त कामनाओं की पूर्ति ईश्वर की कृपा से प्राप्त करता है।
1.ऋगुवेद से प्रमाण--
“यं यं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः।” (ऋग्वेद 2.23.1)
अर्थ :
ब्रह्मणस्पति (ईश्वर) जिस भक्त को अपना बना लेता है, उसकी इच्छाओं और कार्यों को सिद्ध करता है।
2. ऋगुवेद--
“स नः पितेव सूनवे अग्ने सुपायनो भव।” (ऋग्वेद 1.1.9)
अर्थ :
हे अग्ने! जैसे पिता पुत्र की इच्छाओं को पूरा करता है, वैसे ही हमारे लिए कल्याणकारी बनो।
3. यजुर्वेद से प्रमाण--
“तेजोऽसि तेजो मयि धेहि।
वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि।” (यजुर्वेद 19.9)
अर्थ :
हे प्रभु! आप तेजस्वी हैं, हमें भी तेज प्रदान करें; आप वीर्यस्वरूप हैं, हमें भी शक्ति दें।
अर्थात् ईश्वर से अपनी आवश्यक शक्तियों और इच्छित गुणों की प्राप्ति की प्रार्थना।
4. अथर्ववेद से प्रमाण
“भद्रं नो अपि वातय मनः।” (अथर्ववेद 7.52)
अर्थ :
हे प्रभु! हमारे मन में शुभ और कल्याणकारी इच्छाएँ उत्पन्न करें और उन्हें पूर्ण करें।
उपनिषदों से प्रमाण —
1. कठ उपनिषद--
“एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्रया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥” (कठोपनिषद् 1.3.12)
अर्थ :
यह परमात्मा सब प्राणियों में स्थित है, परन्तु सूक्ष्म बुद्धि और भक्ति से उसका अनुभव होता है और वही भक्त को परम फल देता है।
2. मुण्डक उपनिषद --
“यं यं लोकं मनसा संविभाति
विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान्।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामान्।” (3.1.10)
अर्थ :
जिसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, वह जिस लोक और जिन कामनाओं की इच्छा करता है, उन्हें प्राप्त कर लेता है।
3. तैत्तिरीय उपनिषद् --
“स यो ह वै तत्परं ब्रह्म वेद
ब्रह्मैव भवति।” (तैत्तिरीयोपनिषद् 2.1)
अर्थ :
जो मनुष्य परम ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्मरूप होकर सभी इच्छाओं की तृप्ति प्राप्त करता है।
4. छान्दोग्य उपनिषद --
“सर्वे कामा: समश्नन्ति।” (छान्दोग्य उपनिषद् 8.1)
अर्थ :
जो आत्मा और ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
५: श्वेताश्वतर उपनिषद्_.
“यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥” (6.18)
अर्थ :
जो परमात्मा ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और वेदों का ज्ञान देता है, उसी देव की शरण में जाने से साधक को अपनी अभिलाषित सिद्धि प्राप्त होती है।
६-ईश उपनिषद--
“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥” (मंत्र 11)
अर्थ :
जो मनुष्य ज्ञान और कर्म दोनों को समझता है, वह मृत्यु के बंधन से पार होकर अमृत पद को प्राप्त करता है—अर्थात् उसकी सर्वोच्च अभिलाषा पूर्ण होती है।
७-प्रश्न उपनिषद_
“स यो ह वै तत्परं ब्रह्म वेद
ब्रह्मैव भवति।” (प्रश्नोपनिषद् 6.5)
अर्थ :
जो मनुष्य परम ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्मस्वरूप होकर अपनी सर्वोच्च इच्छाओं की सिद्धि प्राप्त करता है।
८-बृहदारण्यक उपनिषद--
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।” (2.4.5)
अर्थ :
आत्मा का दर्शन, श्रवण, मनन और ध्यान करना चाहिए; इससे मनुष्य को परम सत्य और जीवन की पूर्णता प्राप्त होती है।
निष्कर्ष :
उपनिषद यह बताते हैं कि जो व्यक्ति ईश्वर या ब्रह्म की शरण लेकर ज्ञान और भक्ति करता है, उसकी सर्वोच्च कामनाएँ पूर्ण होती हैं और वह परम आनन्द को प्राप्त करता है।
पुराणों से प्रमाण—
1.विष्णु पुराण --
“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।”
अर्थ :
जो भक्त जिस भाव से भगवान की शरण में आता है, भगवान उसी प्रकार उसकी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं और उसे फल देते हैं।
2.शिव पुराण --
“भक्तानामभयं दाता सर्वकामफलप्रदः।”
अर्थ :
भगवान शिव अपने भक्तों को भय से मुक्त करते हैं और उनकी सभी उचित कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
3. भागवत पुराण--
“सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां
नैवार्थदो यत्पुनरर्थिता यतः।” (10.88.8)
अर्थ :
भगवान भक्तों की प्रार्थना सुनकर उन्हें उनकी याचना के अनुसार फल देते हैं।
4. पद्म पुराण --
“भक्तवत्सल भगवान्
सर्वाभीष्टफलप्रदः।”
अर्थ :
भगवान भक्तवत्सल हैं और भक्तों की सभी अभिलाषित कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
५-स्कंद पुराण --
“भक्तानां कामदं देवं
भक्तवत्सलमव्ययम्।”
अर्थ :
भगवान भक्तवत्सल हैं और अपने भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
६. गरुड़ पूराण-
“भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः
ददाति मनसेप्सितम्।”
अर्थ :
भगवान विष्णु भक्ति से प्रसन्न होकर भक्तों को उनके मन की अभिलाषा प्रदान करते हैं।
७- ब्रह्म पुराण --
“आराधितो हि भगवान्
भक्तानां फलदो हरिः।”
अर्थ :
भगवान हरि की आराधना करने पर वे भक्तों को इच्छित फल प्रदान करते हैं।
८-- अग्नि पुराण --
“भक्तानुग्रहकर्ता हि
सर्वकामफलप्रदः।”
अर्थ :
भगवान भक्तों पर अनुग्रह करने वाले और उनकी कामनाओं को फल देने वाले हैं।
निष्कर्ष :
पुराणों में भी स्पष्ट बताया गया है कि भगवान भक्तवत्सल हैं और भक्ति से प्रसन्न होकर भक्तों की धर्मयुक्त कामनाओं को पूर्ण करते है।

गीता से प्रमाण--
(4.11)
“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥”
अर्थ :
हे अर्जुन! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण में आता है, मैं भी उसे उसी प्रकार फल देता हूँ; सभी मनुष्य मेरे मार्ग का ही अनुसरण करते हैं।
2. (9.22)
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”
अर्थ :
जो भक्त निरन्तर मेरा स्मरण और उपासना करते हैं, उनके योग (जो नहीं है उसे प्राप्त कराना) और क्षेम (जो है उसकी रक्षा करना) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
3. (7.21–22)
“यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान्॥”
अर्थ :
भक्त जिस देवता की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा को दृढ़ करता हूँ और उसी के द्वारा वह अपनी इच्छित कामनाओं को प्राप्त करता है।
गीता में स्पष्ट कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से भगवान की शरण में जाता है, भगवान उसकी आवश्यकताओं और धर्मयुक्त कामनाओं की पूर्ति करते महाभारत से प्रमाण
१ --(शान्ति पर्व)
“भक्तानामनुग्रहकर्ता
दाता सर्वाभिलषितफलः।”
अर्थ :
भगवान अपने भक्तों पर अनुग्रह करने वाले और उनकी अभिलाषित कामनाओं को फल देने वाले हैं।
2-- (अनुशासन पर्व)
“यथा यथा हि पुरुषः
श्रद्धया परमेश्वरम्।
तथा तथा लभते सिद्धिं
भक्त्या परमया युतः॥”
अर्थ :
मनुष्य जितनी श्रद्धा और भक्ति से परमेश्वर की उपासना करता है, उसी के अनुसार वह सिद्धि और इच्छित फल प्राप्त करता है।
3.--(शान्ति पर्व)
“न हि भक्तः प्रणश्यति।”
अर्थ :
भगवान के भक्त का कभी नाश नहीं होता; उसकी रक्षा और कल्याण स्वयं भगवान करते हैं।
निष्कर्ष--
महाभारत में भी यह सिद्ध किया गया है कि भगवान भक्तों पर कृपा करके उनकी धर्मयुक्त इच्छाओं को पूर्ण करते हैं।
स्मृति ग्रन्थों से प्रमाण—
१. मनु स्मृति --
“यः श्रद्धया देवताः नित्यं
यजते भक्तिसंयुतः।
तस्य तुष्यन्ति देवाश्च
प्रयच्छन्ति च वाञ्छितम्॥”
अर्थ :
जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से देवताओं की उपासना करता है, देवता उससे प्रसन्न होकर उसकी इच्छित कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
२. याज्ञवल्क्य स्मृति --
“श्रद्धया परया युक्तो
यः कुर्यात् परमेश्वरम्।
तस्य सिद्धिर्भवेत् शीघ्रं
सर्वकामफलप्रदा॥”
अर्थ :
जो मनुष्य परम श्रद्धा से परमेश्वर की उपासना करता है, उसे शीघ्र ही सिद्धि और कामनाओं का फल प्राप्त करते हैं।
३--पराशर स्मृति--
“भक्त्या तुष्टो हरिर्नित्यं
ददाति मनसेप्सितम्।”
अर्थ :
भगवान हरि भक्ति से प्रसन्न होकर भक्तों को उनके मन की अभिलाषा प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष :
स्मृति ग्रन्थों में भी यह बताया गया है कि भक्ति और श्रद्धा से ईश्वर प्रसन्न होकर भक्तों की उचित कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
. नीति ग्रन्थों से प्रमाण--
१-चाणक्य नीति--
“यथा बीजं तथा फलम्।”
अर्थ :
मनुष्य जैसा कर्म और भावना करता है, उसे उसी प्रकार का फल प्राप्त होता है।
अर्थात् भक्ति और सद्भाव से ईश्वर की कृपा तथा इच्छित फल प्राप्त
२-(क)भृतहरि नीति शतक से प्रमाण--
“फलानि कर्मानुगुणानि देहिनां
बुद्धिर्कर्मानुसारिणी।”
अर्थ :
मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है और उसी के अनुसार उसकी बुद्धि भी चलती है।
अर्थात् सत्कर्म और भक्ति से मनुष्य को इच्छित फल प्राप्त होता है।
२(ख) भृतुहरि नीति शतक--
“दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या।”
अर्थ :
मनुष्य को अपने पुरुषार्थ से कार्य करना चाहिए, क्योंकि पुरुषार्थ और ईश्वर की कृपा से ही सफलता और इच्छित फल प्राप्त होते हैं।
3.(क) विदुर नीति से प्रमाण--
“यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति॥”
अर्थ :
जिस प्रकार एक पहिये से रथ नहीं चलता, उसी प्रकार केवल दैव से कार्य सिद्ध नहीं होता; उसमें पुरुषार्थ भी आवश्यक है।
३(ख). विदुर नीति,--
“दैवं पुरुषकारेण यत्नेन विनियोजयेत्।”
अर्थ :
मनुष्य को अपने प्रयास और पुरुषार्थ के साथ ईश्वर की कृपा का सहारा लेना चाहिए; तभी इच्छित फल प्राप्त होते हैं। निष्कर्ष :_
चाणक्य नीति, भृतुहरि नीति शतक और विदुर नीति में यह बताया गया है कि ईश्वर की कृपा और मनुष्य का पुरुषार्थ मिलकर ही इच्छाओं और कार्यों की सिद्धि कराते हैं, जो ऋग्वेद के इस मंत्र के भाव के अनुरूप है।
२-पंचतंत्र से प्रमाण
“देवतानां प्रसादेन
सर्वकार्याणि सिद्ध्यन्ति।”
अर्थ :
देवताओं की कृपा से मनुष्य के कार्य और अभिलाषाएँ सिद्ध हो जाती हैं।
3. योग वशिष्ठ से प्रमाण
“ईश्वरानुग्रहादेव
पुंसामद्वैतवासना।”
अर्थ :
ईश्वर की कृपा से ही मनुष्य को उच्च ज्ञान और जीवन की अभिलाषित सिद्धि प्राप्त होती है।
४--गर्ग संहिता से प्रमाण
“भक्तवत्सल भगवान्
भक्तानां कामदः सदा।”
अर्थ :
भगवान अपने भक्तों पर सदा कृपा करते हैं और उनकी कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
निष्कर्ष :
नीति ग्रन्थों और आर्ष ग्रन्थों में भी यह सिद्ध किया गया है कि भक्ति, श्रद्धा और सद्कर्म से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है और भक्त की धर्मयुक्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
हितोपदेश से प्रमाण—
देवतानां प्रसादेन
सिद्ध्यन्ति सर्वसंपदः।”
अर्थ :
देवताओं (ईश्वर) की कृपा से मनुष्य की सभी संपत्तियाँ और इच्छित कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
“दैवं च पुरुषकारं च
कर्मसिद्धेः कारणम्।”
अर्थ :
किसी कार्य की सिद्धि के लिए ईश्वर की कृपा (दैव) और मनुष्य का पुरुषार्थ दोनों आवश्यक हैं।
निष्कर्ष :
में भी बताया गया है कि मनुष्य के पुरुषार्थ के साथ जब ईश्वर की कृपा मिलती है, तब उसकी इच्छाएँ और कार्य सिद्ध होते हैं।
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Hindi Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) : 112018120
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