“ख़ामोशी में विद्रोह”
भूखों की भीड़ देखो, कैसा तमाशा चल रहा है,
सत्ता के घर में लेकिन जश्न निराला चल रहा है।
डिग्रियों का ढेर लेकर फिर रहा हर युवा अब,
सपनों के शहर में बस दर्द का धुआँ चल रहा है।
खेतों में सूखी मिट्टी, कारख़ाने सब हैं वीरान,
फिर भी मंचों पर विकासों का नज़ारा चल रहा है।
रोटियों की जंग में सड़कों पे उतरा हर इंसाँ,
और कुर्सियों का खेल वैसे ही सारा चल रहा है।
झूठे वादों से यहाँ हर रोज़ बहलाया गया है,
सच पूछो तो देश में कैसा गुज़ारा चल रहा है।
टूटते सपनों को आखिर कौन देगा अब सहारा,
हर तरफ़ बेरोज़गारी का अँधेरा चल रहा है।
एक दिन बदलेगी तस्वीर ये सियासत की ‘प्रसंग’,
आज खामोशी सही- दिल में विद्रोह चल रहा है।
-प्रसंग
प्रणयराज रणवीर