मंडप सजा हुआ था। शहनाई की आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी। सबके चेहरों पर खुशी थी… सिवाय मेरे।
मैं लाल जोड़े में सजी थी, लेकिन दिल अंदर से टूटा हुआ था। आज मेरी शादी थी… लेकिन उस लड़के से नहीं, जिससे मैंने बचपन से प्यार किया था।
“दुल्हन जी, ज़रा मुस्कुरा दीजिए…” फोटोग्राफर ने कहा।
मैंने हल्की-सी मुस्कान देने की कोशिश की, मगर आँसू आँखों से ज़िद कर रहे थे।
सामने मंडप में बैठा था — अर्जुन सिंह राठौड़।
शहर का सबसे रौबदार, घमंडी और अमीर बिज़नेसमैन।
जिसके नाम से लोग डरते थे… और आज वो मेरा पति बनने वाला था।
लेकिन यह शादी मेरी मर्ज़ी से नहीं हो रही थी।
तीन महीने पहले…
पापा का बिज़नेस बुरी तरह डूब गया था। कर्ज़ इतना बढ़ गया कि घर तक बिकने की नौबत आ गई। उसी वक्त अर्जुन ने मदद का हाथ बढ़ाया… मगर एक शर्त पर।
“आपकी बेटी की शादी मुझसे होगी,” उसने ठंडे स्वर में कहा था।
उसकी आँखों में कोई भावना नहीं थी। बस एक अजीब-सी ठंडक थी… जैसे उसे किसी की परवाह नहीं।
पापा मजबूर थे।
और मैं… मैं खामोश।
क्योंकि जिस लड़के से मैं प्यार करती थी, वह मुझे छोड़कर जा चुका था।
उसने आखिरी बार कहा था, “मीरा, मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ… तुम्हें भूल जाओ।”
उस दिन के बाद मेरा दिल खाली हो गया था।
और आज… उसी खाली दिल के साथ मैं किसी और की दुल्हन बनने जा रही थी।
“फेरे शुरू कीजिए,” पंडित जी की आवाज़ आई।
मैं और अर्जुन अग्नि के सामने खड़े थे। उसका हाथ मेरे हाथ को छू रहा था… लेकिन उसमें अपनापन नहीं, बस औपचारिकता थी।
सात फेरे… सात वचन…
हर फेरे के साथ मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी ज़िंदगी मुझसे दूर जा रही हो।
फेरे खत्म हुए।
अब मैं मीरा नहीं रही… मीरा अर्जुन सिंह राठौड़ बन गई थी।
शादी के बाद जब मैं उसके घर पहुँची, तो उसकी हवेली देखकर मैं दंग रह गई।
बड़ी-बड़ी दीवारें, सन्नाटा और अजीब-सी ठंडक।
“यह तुम्हारा कमरा है,” उसने दरवाज़ा खोलते हुए कहा।
मैं अंदर गई। कमरा बहुत सुंदर था… मगर उसमें भी वही सन्नाटा था।
मैंने धीरे से पूछा, “क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकती हूँ?”
वह रुका।
“जल्दी बोलो।”
“आपने… मुझसे शादी क्यों की?”
उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था… लेकिन दर्द जरूर था।
“क्योंकि मुझे किसी पर भरोसा नहीं है,” उसने सख्त आवाज़ में कहा।
“और मुझे एक ऐसी पत्नी चाहिए थी… जो सवाल कम करे।”
मेरे दिल में चुभन हुई।
“और प्यार?” मैंने धीमे से पूछा।
वह हल्का-सा हंसा।
“प्यार…?”
“वो शब्द मेरी ज़िंदगी में नहीं है, मीरा।”
यह सुनकर मेरे अंदर कुछ टूट गया।
वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा और जाते-जाते बोला,
“मेरे कमरे में आने की कोशिश मत करना। हमारी शादी सिर्फ नाम की है।”
दरवाज़ा बंद।
मैं अकेली।
उस रात मैंने बहुत रोया।
शायद किस्मत को मुझसे यही मंज़ूर था।
अगली सुबह…
मैं नीचे आई तो नौकर-चाकर सब मुझे “मालकिन” कहकर बुला रहे थे।
लेकिन अर्जुन वहाँ नहीं था।
“साहब सुबह ही ऑफिस चले गए,” एक नौकरानी ने बताया।
मैंने सोचा, शायद यही अच्छा है।
दिन गुजरने लगे।
अर्जुन मुझसे कम ही बात करता।
घर में रहता, तो भी अपने कमरे में बंद रहता।
लेकिन एक बात अजीब थी…
हर रात 2 बजे के करीब वह किसी से फोन पर बहुत धीमे स्वर में बात करता था।
कभी-कभी उसकी आवाज़ ऊँची भी हो जाती।
एक रात मैं पानी लेने उठी, तो उसके कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला था।
अंदर से आवाज़ आ रही थी—
“नहीं! मैंने कहा ना, वह लड़की इस सब में शामिल नहीं होनी चाहिए!”
मैं चौंक गई।
वह किस बारे में बात कर रहा था?
कौन-सी लड़की?
तभी अचानक दरवाज़ा पूरी तरह खुला।
हमारी आँखें टकराईं।
उसकी नज़रें सख्त हो गईं।
“तुम यहाँ क्या कर रही हो?” उसने गुस्से में पूछा।
मैं घबरा गई।
“मैं… वो… पानी लेने आई थी।”
वह कुछ पल तक मुझे देखता रहा… जैसे मेरे चेहरे पर कोई सच पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।
फिर उसने धीरे से कहा—
“मीरा, मेरी ज़िंदगी में बहुत अंधेरा है। उससे दूर ही रहो… वरना पछताओगी।”
यह कहकर उसने दरवाज़ा बंद कर दिया।
मैं वहीं खड़ी रह गई।
उसकी बातों में डर था… लेकिन साथ ही एक अजीब-सी चिंता भी।
क्या वह सच में मुझसे नफरत करता था?
या मुझे किसी खतरे से बचा रहा था?
उस रात नींद नहीं आई।
मेरे मन में सवाल ही सवाल थे।
अगली सुबह जब मैं नीचे आई, तो टीवी पर न्यूज़ चल रही थी—
“शहर के बड़े बिज़नेस घराने पर गैर-कानूनी डीलिंग का शक…”
स्क्रीन पर अर्जुन की कंपनी का नाम फ्लैश हो रहा था।
मेरे हाथ से कप गिर गया।
क्या मेरा पति किसी गैर-कानूनी काम में शामिल है?
उसी वक्त दरवाज़ा खुला।
अर्जुन अंदर आया।
उसके चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था।
हमारी नज़रें मिलीं।
मैंने हिम्मत करके पूछा—
“यह सब क्या है?”
वह कुछ पल चुप रहा।
फिर धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ा।
इतना करीब… कि मैं उसकी धड़कन महसूस कर सकती थी।
उसने मेरी ठुड्डी हल्के से ऊपर उठाई और कहा—
“तुम्हें जितना दिख रहा है… सच उससे कहीं ज़्यादा खतरनाक है, मीरा।”
मेरी साँसें तेज़ हो गईं।
“और अगर तुमने मेरे बारे में सच्चाई जानने की कोशिश की…”
वह रुका…
“तो शायद तुम्हारी ज़िंदगी बदल जाएगी।”
मैंने डर और जिज्ञासा के बीच काँपते हुए पूछा—
“कैसी सच्चाई?”
उसने मेरी आँखों में सीधे देखते हुए कहा—
“मैं वो इंसान नहीं हूँ… जो तुम समझ रही हो।”
उसी वक्त बाहर से गोलियों की आवाज़ गूँजी।
धड़ाम!!!
घर के गेट पर हमला हो चुका था।
अर्जुन ने तुरंत मेरा हाथ पकड़ा और कहा—
“अब तुम्हें सच जानना ही पड़ेगा…”
और अगले ही पल, उसने अलमारी के अंदर से एक बंदूक निकाली।
मैं स्तब्ध खड़ी थी।
मेरा पति…
एक बिज़नेसमैन नहीं…
कुछ और था।
और शायद मेरी शादी…
सिर्फ एक सौदा नहीं…
बल्कि किसी बड़ी साजिश का हिस्सा थी।
(जारी रहेगा…