ऋगुवेद सूक्ति-- (२६) की व्याख्या में
मंत्र:
अपृणन्तिमभि सं यन्ति शोका:।
— ऋग्वेद १.१२५.७
पदच्छेद--
अपृणन्तिम् + अभि + सं + यन्ति + शोकाः
शब्दार्थ--
अपृणन्तिम् — जो न पूरयति, दान न देता, उपकार न करने वाला (कृपण)
अभि सं यन्ति — चारों ओर से आ घेर लेते हैं
शोकाः — दुःख, संताप
भावार्थ--
जो व्यक्ति दूसरों की सहायता नहीं करता, दान या उपकार नहीं करता, उस कृपण को शोक और दुःख चारों ओर से घेर लेते हैं।
“उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है”
इसके समर्थन में वेदों से प्रमाण इस प्रकार हैं:
१. मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत् स तस्य।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥**
— ऋग्वेद १०.११७.६
भावार्थ:
जो मूर्ख (अप्रचेताः) अकेला ही भोजन करता है, न अतिथि को देता है, न मित्र को — उसका अन्न व्यर्थ है। वह पाप ही खाता है और उसका जीवन निष्फल होता है।
२. शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर।
— अथर्ववेद ३.२४.५
भावार्थ:
सौ हाथों से अर्जन करो और हजार हाथों से दान करो।
(अर्थात् संचय का उद्देश्य केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि लोकहित के लिए होना चाहिए।)
३. न स सखा यो न ददाति सख्ये।
— ऋग्वेद ४.३३.११
भावार्थ:
वह सखा (मित्र) नहीं है जो आवश्यकता पड़ने पर सहायता नहीं करता।
निष्कर्ष--
वेदों का स्पष्ट सिद्धांत है कि —
दान, सहयोग और परोपकार धर्म हैं।
कृपणता और स्वार्थ अंततः दुःख (शोक) का कारण बनते हैं।
जो लोकहित में धन का उपयोग नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ कहा गया है।
“उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है” — के समर्थन में उपनिषदों से प्रमाण इस प्रकार हैं:
१. “त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।”
— कैवल्य उपनिषद् ३
भावार्थ:
केवल त्याग (दान, उदारता) से ही कुछ महापुरुष अमृतत्व को प्राप्त हुए हैं।
संकेत है कि संचय नहीं, त्याग ही कल्याण का मार्ग है।
२. “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:”
— ईशावास्य उपनिषद्-- १
भावार्थ:
त्याग की भावना से भोग करो (अर्थात् आसक्ति और स्वार्थ छोड़कर जीवन जियो)।
लोभ और कृपणता दुःख का कारण हैं।
३. “न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः।”
— कठोपनिषद् १.२.२७
भावार्थ:
मनुष्य केवल धन से तृप्त नहीं होता।
केवल संचय करने वाला अंततः अशांत ही रहता है।
४. “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवति…”
— कठोपनिषद् २.३.१४
भावार्थ:
जब हृदय के सभी स्वार्थपूर्ण कामनाएँ छूट जाती हैं, तभी मनुष्य अमृत (शोक-रहित) अवस्था को प्राप्त होता है।
५. “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।”
— मुण्डक उपनिषद् ३.२.३
भावार्थ:
न कर्म से, न संतान से, न धन से केवल त्याग से ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है।
संचय नहीं, त्याग ही शोक-निवारण का मार्ग है।
६. “तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया च।”
— मुण्डक उपनिषद् ३.१.५
भावार्थ:
तप, संयम, श्रद्धा और विद्या से ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
यहाँ लोभ या कृपणता का कोई स्थान नहीं — साधना उदार हृदय से होती है।
७. “आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते…।”
— तैत्तिरीय उपनिषद् ३.६
भावार्थ:
समस्त प्राणी आनन्द से उत्पन्न होते हैं, आनन्द से जीते हैं और अंत में आनन्द में ही लीन हो जाते हैं।
आनन्द (विस्तार) ही सत्य है, संकुचन (कृपणता) शोक का कारण है।
८. “यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरेण पश्यति…”
— बृहदारण्यक उपनिषद् ४.५.१५
भावार्थ:
जहाँ द्वैत (अलगाव) का भाव है, वहाँ भय और दुःख है।
जब व्यक्ति केवल ‘मैं और मेरा’ में सिमटता है, वहीं शोक उत्पन्न होता है।
९. “दत्त, दयध्वं, दम्यत।”
— बृहदारण्यक उपनिषद् ५.२.३
भावार्थ:
दान करो, दया करो, और इन्द्रियों का संयम रखो।
- उपनिषद स्वयं दान और करुणा को अनिवार्य धर्म बताते हैं।
सार--
उपनिषदों का निष्कर्ष स्पष्ट है —
त्याग, दान, दया और विस्तार से अमृतत्व (शोक-रहित अवस्था) प्राप्त होती है।
लोभ, स्वार्थ और संकुचन दुःख और भय के कारण हैं।
“कृपण/उपकारहीन व्यक्ति को शोक घेर लेता है; दान से कल्याण होता है”
इसके समर्थन में पुराणों से प्रमाण-- श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१.दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
— पद्म पुराण
अर्थ:
धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न दान करता है, न भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति अर्थात् नाश ही होती है।
कृपणता अंततः दुःख और हानि का कारण बनती है।
२.अदत्तदानात् भवति दरिद्रता,
दरिद्रतायाः परिभवो भवति।
परिभवाद् दुःखसमन्वितः स्यात्॥
— गरुड पुराण
अर्थ:
दान न करने से दरिद्रता आती है, दरिद्रता से अपमान और अपमान से दुःख उत्पन्न होता है।
कृपणता शोक का मूल कारण है।
३.यज्ञदानतपोभिर्वै पावनानि मनीषिणाम्।
— विष्णु पुराण
अर्थ:
यज्ञ, दान और तप — ये बुद्धिमानों को पवित्र करने वाले हैं।
दान से आत्मशुद्धि और शोक-निवारण होता है।
४.अर्थानामर्जने दुःखं अर्जितानां च रक्षणे।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः॥
— भागवत पुराण ११.२३.१५
अर्थ:
धन कमाने में दुःख है, उसकी रक्षा में दुःख है, नाश में दुःख है और व्यय में भी दुःख है — धन तो कष्ट का आश्रय है।
यदि धन का उपयोग लोकहित में न हो, तो वह शोक का कारण बनता है।
५. अन्नदानं परं दानं विद्यानां परमा गतिः।
अन्नेन क्षणिका तृप्तिः विद्या तृप्तिः यावज्जीवम्॥
— स्कन्द पुराण
अर्थ:
अन्नदान सर्वोत्तम दान है; विद्या सर्वोत्तम संपदा है। अन्न से क्षणिक तृप्ति मिलती है, पर विद्या से जीवनभर तृप्ति मिलती है।
दान ही स्थायी संतोष का कारण है।
६. न दानात् परमो धर्मो न दानात् परमा गतिः।
दानं हि सर्वपापानां नाशनं परमं स्मृतम्॥
— अग्नि पुराण
अर्थ:
दान से बढ़कर कोई धर्म नहीं, दान से बढ़कर कोई श्रेष्ठ गति नहीं। दान समस्त पापों का नाश करने वाला है।
कृपणता पाप और शोक का कारण है, दान उसका निवारण करता है।
७. दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽर्द्रचित्ता।
— देवी भागवत पुराण
अर्थ:
(देवी से प्रार्थना) — हे माता! आप दारिद्र्य, दुःख और भय को हरने वाली हैं, और सदा उपकार करने वाली करुणामयी हैं।
उपकार और करुणा ही दुःख-निवारण का मार्ग हैं।
८. धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥
— ब्रह्म पुराण
अर्थ:
बुद्धिमान व्यक्ति धन और जीवन भी परोपकार के लिए त्याग दे। जब नाश निश्चित है, तो शुभ कार्य हेतु त्याग ही श्रेष्ठ है।
संचय की अपेक्षा परोपकार ही श्रेष्ठ है।
सार--
पुराणों का निष्कर्ष यही है —
दान, “कृपण/उपकारहीन व्यक्ति शोक और पाप में फँसता है; दान से शुद्धि और शांति मिलती है।” इसके समर्थन में गीता से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
— भगवद्गीता ३.१३
अर्थ:
जो लोग यज्ञ (अर्थात् लोकहित) के लिए कर्म करके शेष अन्न ग्रहण करते हैं, वे पापों से मुक्त होते हैं; परन्तु जो केवल अपने लिए पकाते (भोगते) हैं, वे पाप ही खाते हैं।
केवल स्वार्थ के लिए जीना दुःख और बंधन का कारण है।
२. त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
— भगवद्गीता १६.२१
अर्थ:
काम, क्रोध और लोभ — ये आत्मा के नाश के तीन द्वार हैं; अतः इन्हें त्याग देना चाहिए।
लोभ (कृपणता) शोक और पतन का कारण है।
३. दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
— भगवद्गीता १७.२०
अर्थ:
जो दान केवल कर्तव्य समझकर, योग्य व्यक्ति को, उचित समय और स्थान पर, बिना प्रतिफल की आशा के दिया जाता है — वह सात्त्विक दान है।
निष्काम दान शुद्धि और शांति का कारण है।
४. कर्पण्यदोषोपहतस्वभावः…
— भगवद्गीता २.७
अर्थ:
अर्जुन कहते हैं — “मैं कर्पण्य (दीनता/कृपणता) के दोष से ग्रस्त हो गया हूँ…”
गीता में ‘कर्पण्य’ को दोष कहा गया है, जो मोह और शोक का कारण बनता है।
निष्कर्ष--
गीता का स्पष्ट संदेश है —
स्वार्थ और लोभ बंधन और दुःख के कारण हैं। यज्ञभाव, दान और त्याग से पाप क्षय होता है और शांति मिलती है।
— “कृपण/उपकारहीन व्यक्ति शोक का भागी होता है; दान और परोपकार से कल्याण होता है”। इसके समर्थन में महाभारत से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
— महाभारत (शान्ति पर्व)
अर्थ:
धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न दान करता है, न भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति (नाश) होती है।
कृपणता अंततः दुःख और हानि का कारण बनती है।
२. अदत्तदानात् भवति दरिद्रता,
दरिद्रतायाः परिभवो भवति।
परिभवाद् दुःखसमन्वितः स्यात्॥
— महाभारत (अनुशासन पर्व)
अर्थ:
दान न करने से दरिद्रता आती है; दरिद्रता से अपमान, और अपमान से दुःख उत्पन्न होता है।
कृपणता शोक का मूल कारण है।
३. न दानात् परमो धर्मो न दानात् परमा गतिः।
— महाभारत (अनुशासन पर्व)
अर्थ:
दान से बढ़कर कोई धर्म नहीं, और दान से बढ़कर कोई श्रेष्ठ गति नहीं।
दान ही शांति और कल्याण का मार्ग है।
४. धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥
— महाभारत (शान्ति पर्व)
अर्थ:
बुद्धिमान व्यक्ति धन और जीवन भी परोपकार के लिए त्याग दे; जब नाश निश्चित है, तो शुभ हेतु त्याग ही श्रेष्ठ है।
निष्कर्ष--
महाभारत का स्पष्ट सिद्धांत है —
दान, त्याग और परोपकार से धर्म, यश और शांति मिलती है।
आपके सिद्धांत — “कृपण/उपकारहीन व्यक्ति शोक और पतन को प्राप्त होता है; दान और परोपकार से कल्याण होता है।” इसके समर्थन में स्मृति-ग्रन्थों से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. दानधर्मं निषेवेत नित्यं शक्त्यनुसारतः।
दानं हि परमं धर्मं दानेनैव सुखं लभेत्॥
— मनुस्मृति
अर्थ:
मनुष्य को अपनी शक्ति के अनुसार नित्य दान-धर्म का पालन करना चाहिए; दान ही परम धर्म है और दान से ही सुख प्राप्त होता है।
दान सुख और शांति का कारण है।
२. अर्थानामार्जने दुःखं अर्जितानां च रक्षणे।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः॥
— याज्ञवल्क्यस्मृति
अर्थ:
धन कमाने में दुःख, उसकी रक्षा में दुःख, नाश में दुःख और व्यय में भी दुःख — धन कष्ट का आश्रय है।
यदि धन लोकहित में न लगे, तो वह शोक का कारण बनता है।
३. यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
— पराशर स्मृति--
अर्थ:
यज्ञ, दान और तप का कर्म त्यागने योग्य नहीं; यह अवश्य करने योग्य है।
दान अनिवार्य धर्म है।
४. अदत्तदानात् भवति दरिद्रता दरिद्रतायाः परिभवः स्मृतः।
परिभवाद् दुःखमवाप्नुयात्॥
— बृहस्पति स्मृति
अर्थ:
दान न करने से दरिद्रता आती है; दरिद्रता से अपमान और अपमान से दुःख प्राप्त होता है।
कृपणता शोक का कारण है।
सार--
स्मृति-ग्रन्थों का निष्कर्ष है —
दान, त्याग और परोपकार से सुख, धर्म और यश मिलता है।
कृपणता और स्वार्थ अंततः दुःख और अपमान का कारण बनते हैं। — “कृपण/उपकारहीन व्यक्ति शोक का भागी होता है; दान और परोपकार से यश व शांति मिलती है” —
इसके समर्थन में प्रमुख नीति-ग्रन्थों से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. भर्तृहरि नीतिशतक--
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
अर्थ:
धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न दान करता है, न भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति (नाश) होती है।
कृपणता अंततः हानि और शोक का कारण बनती है।
२. हितोपदेश--
त्यागेनैके गुणाः सर्वे न त्यागेन कदाचन।
त्यागेन हि महत्पुण्यं न त्यागेन महत्पदम्॥
अर्थ:
त्याग से ही सभी गुण प्राप्त होते हैं; त्याग से महान पुण्य और उच्च पद की प्राप्ति होती है।
उदारता उन्नति का मार्ग है।
३. पञ्चतन्त्र--
अर्थानामार्जने दुःखं अर्जितानां च रक्षणे।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः॥
अर्थ:
धन कमाने, बचाने, नष्ट होने और खर्च करने — सभी में दुःख है; धन तो कष्ट का आधार है।
यदि धन लोकहित में न लगे, तो वह शोक का कारण बनता है।
४. चाणक्य नीति--
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
अर्थ:
कुल के लिए एक व्यक्ति का त्याग करे; ग्राम के लिए कुल का; जनपद के लिए ग्राम का; और आत्मकल्याण हेतु पृथ्वी का भी त्याग करे।
परार्थ-त्याग को सर्वोच्च नीति बताया गया है।
५. शुक्रनीति-
न दानात् परमो धर्मो न दानात् परमा गतिः।
दानं हि सर्वभूतेषु कीर्तिमायुः श्रियं ददाति॥
अर्थ:
दान से बढ़कर कोई धर्म नहीं; दान ही कीर्ति, आयु और समृद्धि देता है।
दान से ही स्थायी सुख और सम्मान मिलता है।
सार--
नीति-ग्रन्थों का स्पष्ट निष्कर्ष है —
दान, त्याग और परोपकार से यश, पुण्य और शांति मिलती है।
कृपणता और स्वार्थ अंततः शोक, हानि और अपमान का कारण बनते हैं।
“कृपणता और संकुचित ‘मेरा-मेरा’ भाव शोक का कारण है; त्याग और विस्तार से शांति मिलती है”
इसके समर्थन में योगवसिष्ठ से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. योगवसिष्ठ (वैराग्य प्रकरण)
अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
अर्थ:
“यह मेरा है, यह नहीं” — ऐसा विचार संकुचित बुद्धि वालों का है; उदार हृदय वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
संकीर्णता शोक का कारण है, उदारता ही शांति का मार्ग है।
२. योगवसिष्ठ (वैराग्य प्रकरण)
लोभ एव महाशत्रुः शोकमोहप्रदायकः।
तस्मात् त्यजेत् प्रयत्नेन लोभं दुःखस्य कारणम्॥
अर्थ:
लोभ महान शत्रु है, जो शोक और मोह उत्पन्न करता है; इसलिए प्रयत्नपूर्वक लोभ का त्याग करना चाहिए, क्योंकि वही दुःख का कारण है।
३. योगवसिष्ठ (उपशम प्रकरण)
त्यागेनैव सुखं लोके त्यागेनैव परं पदम्।
न त्यागात् विद्यते किंचित् श्रेयः शान्तिकरं नृणाम्॥
अर्थ:
त्याग से ही लोक में सुख है और त्याग से ही परम पद की प्राप्ति होती है; त्याग से बढ़कर मनुष्यों के लिए कोई शांति देने वाला साधन नहीं है।
४. योगवसिष्ठ (निर्वाण प्रकरण)
चित्तमेव हि संसारो रागाद्यैः कलुषीकृतम्।
तदेव तैर्विनिर्मुक्तं भवत्येव निरामयम्॥
अर्थ:
राग-द्वेष आदि से कलुषित चित्त ही संसार (दुःख) है; उन्हीं से मुक्त चित्त ही निरामय (शोक-रहित) हो जाता है।
लोभ-राग से शोक उत्पन्न होता है, त्याग से शांति मिलती है।
सार
योगवसिष्ठ का निष्कर्ष स्पष्ट है —
लोभ, संकुचितता और ‘ममत्व’ शोक के मूल कारण हैं।
त्याग, उदारता और विश्व-बंधुत्व से शांति, विस्तार और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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