“मजबूरी के साए”
होके मजबूर उसने बुलाया होगा,
छुपा दर्द जो दिल में दबाया होगा।
आँखों में नमी, लबों पे खामोशी,
कुछ अधूरा सा कहीं सुनाया होगा।
रास्तों की भीड़ में खोया हर पैग़ाम,
कहीं गहरा राज़ उसने छुपाया होगा।
रिश्तों की कसक में छुपा हर फसाना,
किसी ने कभी महसूस करवाया होगा।
हर जुबां से छिपा, हर दिल से दूर,
होके मजबूर, ए सब कहलाया होगा।
चलते-चलते रास्तों में यादें बुनता,
'प्रसंग' यही सोच में डूबाया होगा।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर