हम काटने लगे हैं।
हम अब रोते नहीं साहब,
हम काटने लगे हैं-
शब्दों से,
नज़रों से,
सीधे सच से।
क्योंकि
बहुत देर तक सहने वाला
एक दिन
पूछना सीख लेता है।
किसान जब खामोश होता है,
तो समझो-
तूफ़ान खेत में नहीं,
सीने में उग रहा है।
धरती धैर्य रखती है-
पर अपमान नहीं।
मज़दूर की हथेली
अब सिर्फ़ छाली नहीं,
सबूत है-
कि ये देश
उसकी मेहनत से चलता है,
और फिर भी
उसे चलने नहीं देता।
औरत अब डर से नहीं काँपती,
वो ग़ुस्से से स्थिर होती है।
जिस दिन उसकी आँख
सीधी हो गई,
उस दिन
किसी की मर्दानगी
काम नहीं आएगी।
कर्मचारी अब
फ़ाइल नहीं पलटता,
वो अपने भीतर का
ज़मीर पलटता है।
और ज़मीर
जब भारी हो जाए,
तो कुर्सियाँ
हल्की पड़ जाती हैं।
विद्यार्थी अब
भविष्य नहीं पूछता-
वो वर्तमान को
कटघरे में खड़ा करता है।
और सवाल
जब ठीक से खड़े हो जाएँ,
तो झूठ
बैठ जाता है।
हमें समझाया गया-
शांत रहो।
लेकिन किसी ने नहीं बताया
कि शांति की भी एक हद होती है,
उसके बाद
वो कायरता कहलाती है।
हम अब
डर को पहचानते हैं।
वो ऊपर नहीं रहता-
वो भीतर डाला जाता है।
और जो भीतर डाला जाए,
उसे बाहर फेंका
जा सकता है।
हम भीड़ नहीं हैं।
हम वो लोग हैं
जो बहुत देर तक
चुप रहे-
और अब
हर शब्द
वजनदार बोलते हैं।
हमारी आवाज़
अब चीख नहीं,
फ़ैसला है।
हमारी चाल
अब हिचक नहीं,
इरादा है।
हमें रोकने की कोशिश मत करना।
हम भाग नहीं रहे-
हम आ रहे हैं।
क्योंकि
जिस समाज ने
अपने आम आदमी को
खुद पर गर्व करना सिखा दिया,
उसे कोई सत्ता
लंबे समय तक
झुका नहीं सकती।
आज हम कहते हैं-
शांति हमारी पसंद है,
कमज़ोरी नहीं।
और अगर
इंसान होना
अपराध है,
तो हाँ-
हम अपराधी हैं।
हम कटेंगे नहीं।
हम बिकेंगे नहीं।
और अब
हम मिटेंगे नहीं।
क्योंकि
अब हमारे भीतर
डर नहीं-
टकराव है।
"प्रसंग"
प्रणयराज रणवीर