Hindi Quote in Poem by kajal jha

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“मैं अभी बाकी हूँ”

भीड़ भरे इस शहर में,
मैंने अक्सर खुद को खोया है,
चेहरों की इस मेला-धूप में
मन को तन्हा ही रोया है।
हँसी ओढ़कर निकली थी घर से,
आँखों में सावन छिपाए हुए,
सबको अपना दर्द सुनाया,
पर अपने ज़ख्म दबाए हुए।
रिश्तों की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते
कितनी बार फिसली हूँ मैं,
सबकी ख़्वाहिश पूरी करते
खुद से ही बिछड़ी हूँ मैं।
आईने ने जब सच बोला,
दिल थोड़ा-सा काँप गया,
“तू थक गई है अब मान भी ले,”
अंदर कोई चीख गया।
पर हार मानना फितरत में नहीं,
टूटकर भी जुड़ जाती हूँ,
रात अगर सौ बार गिराए,
सुबह बनकर उठ जाती हूँ।
मैंने सीखा है अंधेरों से
रोशनी खुद जलानी है,
कदम डगमगाएँ चाहे जितना,
राह नई बनानी है।
लोग कहेंगे — “बहुत बदली है,”
हाँ, मैं अब वैसी नहीं रही,
जो हर बात पे चुप रह जाती,
अब वो खामोशी नहीं रही।
अब शब्द मेरे हथियार बने हैं,
सपने मेरी ढाल हुए,
आँसू जो कल तक कमज़ोरी थे,
आज वही कमाल हुए।
मैंने दर्द को दोस्त बनाया,
उससे जीना सीखा है,
जिसने दिल को तोड़ दिया था,
उसी से हँसना सीखा है।
हाँ, कुछ रिश्ते छूट गए पीछे,
कुछ रास्ते अनजाने हैं,
पर जो मेरे अपने थे ही नहीं,
उनके क्या अफसाने हैं।
मैं अब खुद की आवाज़ बनूँगी,
भीतर की आग जलाऊँगी,
जो मुझको कमज़ोर समझेगा,
उसे अपना सच दिखलाऊँगी।
मैं नदी हूँ, रुकना क्या जानूँ,
पत्थर भी रास्ता देंगे,
मैं सपना हूँ, अधूरा सही,
एक दिन पंख लगा लेंगे।
तुम देखना, ये वक़्त गवाह होगा,
मैं फिर से मुस्कुराऊँगी,
टूटी हुई नहीं, मज़बूत बनकर
अपनी पहचान बनाऊँगी।
क्योंकि कहानी अभी खत्म नहीं,
अधूरा सा एक मुकाम हूँ,
गिरकर भी जो खड़ी हुई है —
हाँ, मैं वही इंसान हूँ।
मैं हार नहीं, शुरुआत हूँ,
मैं अंत नहीं, उड़ान हूँ,
जो खुद से फिर मिल आई है —
मैं अभी बाकी हूँ…
हाँ, मैं अभी बाकी हूँ।

Hindi Poem by kajal jha : 112017060
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