शीर्षक - "जरुरी हैं क्या?
बात-बात में मुझसे लड़ती हो, कुछ पल में मुझसे गले लिपट जाती हो।
डॉट दूं तो तुम मुंह फुला लेती हो... मुँह फुलाना ज़रूरी है क्या?
तुससे दूर चला जाऊँ, नयनों से आँसुओं की दरिया बहाने लगती हो।
मिलने की सिफ़ारिश करने लगती हो,
पल भर न मिलूँ तो आँखों से दरिया बहा देती हो।
दरिया बहाना ज़रूरी है क्या?
फूलों का ताज समझती हो, मुरझा न जाउँ, बड़ा खयाल रखती हो।
खयाल रखने से मना कर दूँ तो मुँह फुलाना ज़रूरी है क्या?
कवि-एसटीडी मौर्य✍️
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