हस्तमैथुन
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सभ्यताएँ
उन इच्छाओं से डरती आई हैं
जो अकेले में
पूरी हो जाती हैं,
क्योंकि उन्हें
बाज़ार नहीं चाहिए,
संस्था नहीं चाहिए,
ईश्वर भी नहीं चाहिए।
ऐसी इच्छाओं में मनुष्य
न उपभोक्ता होता है
न भक्त,
न पति और न कोई पुत्र
उस वक़्त वो देह और
अपने होने के अधिकार के सिवा कुछ नहीं होता ।
शायद इसलिए
हस्थमैथुन को छिपाना सिखाया गया,
शर्म से ढक दिया गया,
और अराजक तत्त्व कह कर
गलत ठहरा दिया गया।
क्योंकि
अपने होने के अधिकार से
एक सहज स्वतंत्रता का अभिप्राय है
और स्वतंत्रता
हमेशा
सबसे पहले
अनैतिक घोषित की जाती है।