जैसा देखा वैसा पाया।
दर्द लिखूँ तो लोग कहते हैं, टूटा है कहीं दिल तेरा,
मोहब्बत लिखूँ तो कहते हैं, उलझा है मन तेरा।
क़लम उठे तो हर शब्द, इल्ज़ाम बन जाता है,
सच लिख दूँ तो पूछते हैं, क्या है इरादा तेरा।
ख़ामोशी की ज़बाँ समझे, इतना हुनर किसमें,
शोर में ही खो जाता है, अक्सर मतलब तेरा।
मैंने तो आईना रखा, वक़्त के चेहरे के आगे,
जिसने जैसा देख लिया, वैसा है चेहरा तेरा।
दर्द हो या चाहत हो, दोनों ही इबादत हैं,
“प्रसंग” बस लिखता है, जैसा है रिश्ता तेरा।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर