“मैं चुप हूँ…
क्योंकि कहने से कुछ बदलता नहीं।”
“मैं बोल सकती थी,
पर उसने सुनना छोड़ दिया।”
“मेरी खामोशी,
उसकी आदत बन गई है।”
“मैं रोती नहीं,
बस अंदर से गिरती हूँ।”
“मैंने शिकायतें दबा दीं,
रिश्ता बचाने के लिए।”
“मैं नाराज़ नहीं…
बस थक गई हूँ।”
“मैं उसे खोना नहीं चाहती,
इसलिए खुद को खो दिया।”
“मैंने बोलना कम किया,
और उसने महसूस करना।”
“मेरी चुप्पी में,
सारा दर्द रहता है।”
“मैं ठीक हूँ कहती हूँ,
क्योंकि सच भारी है।”
“मैं दूर नहीं हुई,
बस शांत हो गई।”
“मैंने उम्मीदें छोड़ीं,
उसे नहीं।”
“मैं बोलूँ भी तो क्या,
जब सुनने वाला वही नहीं।”
“मेरी खामोशी,
मेरी हार नहीं… मेरी थकान है।”
“मैंने रिश्ता बचाया,
और खुद को चुप करा दिया।”