क्या मुझे भी मिलेगी वो दुनिया
अब मैं भी बढ़ना चाहती हूँ उस दिशा में,
जहाँ अस्तित्व को लिंग से नहीं,
मानवता से पहचाना जाए।
जहाँ पहचान का पहला अक्षर — इंसान हो।
क्या मुझे भी मिलेगी वो दुनिया,
जहाँ मेरी आवाज़ पर पहरे न हों,
जहाँ मेरे शब्दों को
मेरे होने से कम न आँका जाए।
क्या वहाँ कोई ठहराएगा मुझे
इन सीमाओं के अदृश्य घेरों में?
क्या कोई पूछेगा मुझसे —
क्यों तोड़ी तुमने परंपराओं की जंजीरें?
क्यों लांघी तुमने
उस चौखट की चुप दीवारें,
जिसे सदियों से
औरत की सीमा कहा गया?
क्या वहाँ कोई रोकेगा मुझे
मेरी उड़ान की दहलीज़ पर?
या खुलेगा मेरे सामने
संभावनाओं का अनंत आकाश —
जहाँ मैं बन सकूँ
अपनी ही परिभाषा।
मैं औरत हूँ —
पर उससे पहले मैं चेतना हूँ,
मैं स्वप्न हूँ,
मैं संघर्ष की वह अग्नि हूँ
जो राख से भी जन्म लेती है।