एक बिका हुआ पत्रकार
नेताओं की गोदी में, ये बैठे रहते हफ्ते चार,
दो कौड़ी के लालच में, यहाँ बिकते रहे पत्रकार,
गंदा पानी, टूटी सड़कें, सच के सामने ये मुँह छुपाते,
चाटुकारिता की हद तो देखो, अरावली तोड़ने के फायदे गिनाते,
झूठी सारी न्यूज़ फैलाकर, हक़ माँगने पर देशद्रोही कहलाते,
देशभक्तों को जेल में डालकर, खुद को विश्वगुरु कहलाते।
शिक्षा, रोज़गार की बातें छोड़कर, वंदे मातरम् पर बहस कराते,
हिंदू–मुस्लिम से मन भर गया, अब हिंदू–हिंदू को लड़वाते।
जनता सारी जाग्रत हुई, बिना डरे कहेंगी दिल की बात,
हिंदुस्तान की क़सम खाकर, मिलकर बदलेंगे यह सरकार।