मैं और मेरे अह्सास
खुशबू
प्यार की खुश्बू से जिंदगी के बाग में बसंत छाई हुई हैं l
आत्म सम्मान, जीने की चाहत और ताक़त
पाई हुई हैं ll
जी भरके बरसने की चाहत हुई तो कड़ी
सर्दियों में l
बनके बादल रिमझिम बारिस की बौछार
लाई हुई हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह