वृत्त कहानी – 1
शहर के बाहर निर्वात-सी सुनसान सड़क पर गाड़ी धीमे चल रही थी। काले रंग का वाहन अंधकार से ही पैदा हुआ लग रहा था। रास्ते के दोनों तरफ घने पेड़ों के पत्ते हवा से लहरा रहे थे।
फुटपाथ पर धूल थी। वहाँ से दिन में भी कोई नहीं गुजरता था। जगह ही ऐसी थी। खेतों का इलाका पीछे छूट चुका था। अब माहौल में मनुष्य के होने की संभावना न के बराबर थी—सिवाय गाड़ी में बैठे उस मनुष्य के।
क्या कर रहा था वह इस सन्नाटे में? बियाबान सड़कों पर सियाह गाड़ी में इस तरह के वातावरण में कोई यूँ ही तो नहीं घूमता।
पर उसका वहाँ होना इस बात की चुगली कर रहा था कि कुछ तो हुआ था—ऐसा कुछ, जो भीतर तक बेचैन कर दे। नहीं तो उसके यहाँ होने की कोई वजह ही नहीं थी।
पेशे से वह आदमी इस शहर का कमिश्नर था। दिखने में न तो बहुत बूढ़ा, न ही बहुत जवान। चौकोर चेहरा, धँसी हुई आँखें, मद्धम नाक, गालों पर गड्ढे—ये सब इस बात की निशानी थे कि कभी बहुत बड़े रोग से उसका सामना हुआ था—रोग या…
बाल संवारे हुए थे। मूँछों को ताव नहीं दिया था; वे बस अपनी जगह थीं। निचला होंठ थोड़ा बड़ा था—यही वजह थी कि ऊपर का होंठ थोड़ा छोटा नजर आता। ऐसा लगता, मानो उसने अपने निचले होंठों में पान दबाकर रखा हो।
उसका नाम विलास सारंगी था। कद-काठी न तो बहुत पतली थी और न ही वह इंसान हट्टा-कट्टा था। विलास लेदर की जाड़े वाली जैकिट से हमेशा खुद को ढके रखता था। नीचे खाकी पैंट होती और गले में लाल चौकोनों की लकीर वाला पंचा लटका रहता।
सारंगी अब तक विवाहशुदा नहीं था। शादी करने या न करने का कोई खास कारण नहीं था—बस हुई नहीं थी। और अब तो कोई सवाल ही नहीं उठता था कि इस तमाम झमेले में वह फँस जाए।
लेकिन अगर सही उम्र में विलास सारंगी शादी करता, तो उसकी संतानें वर्तमान में ठीक बीस साल की होतीं। उसने शादी नहीं की क्योंकि उसके फक्कड़ पिता ने कभी विवाह नहीं किया था।
पिता गटर या नाली में पड़े रहते। उनके शरीर से बदबू आती—मुँह से और भी उग्र, बासी बू। वे कभी नहाते नहीं थे।
पिता ने विलास को अपना ‘सारंगी’ नाम दिया था। बाकी ‘विलास’ नाम तो किसी पान के ठेलेवाले भैया ने उसे चिपका दिया था।
उसके पिता को विलास सूखी नदी के पास रेत पर पड़ा हुआ मिला था। किसी मांत्रिक की अधूरी साधना में, नदी के ठीक बीचोबीच, गांजे से बने वृत्ताकार गोले में एक नवजात बच्चा बिलग रहा था। मांत्रिक अपनी साधना अधूरी छोड़ चला गया था—चला गया था या भाग गया था, कहना मुश्किल था। पिता ने नवजात बच्चे को उठाया और गंदी नाली के पास चले आए। उन्होंने उसे पाला—या कहना सही रहेगा कि विलास अपने आप ही पल गया।
पिता नहीं जानते थे कि वह मांत्रिक उस नवजात बच्चे, यानी विलास, को कहाँ से उठाकर लाया था।
मांत्रिक बहुत गांजा फूँकता था। गाँव में भीख माँगता, खाना खाता—और फिर गांजा फूँकता। शायद इसलिए विलास के शरीर से तीव्र गांजे की गंध आती थी, पर नाली के काले पानी से वह हमेशा बुझ जाती। पूरे गाँव में कोई भी उस मांत्रिक को टोकता नहीं था। गाँव उससे डरता था।
मांत्रिक हर पेड़ के इर्द-गिर्द गांजे से गोल वृत्त बनाता। फिर वह पेड़ सूखने लगता। नदी भी शायद इसी वजह से सूखी थी। यह मंत्र फूँकने वाला गाँव में कहाँ से आया था—किसी को पता नहीं था।
धीरे-धीरे विलास के पिता जैसे और भी लोग उसकी संगत में रहने लगे। वे सब गोलाकार बैठते, बीचोंबीच एक अलाव लगाते। उस आग से गांजे की तीव्र गंध गाँव के रसोईघरों से निकले सफेद धुएँ में मिल जाती।
वे लोग काली गुड़िया के भीतर गांजा रखते। उन दिनों ऐसी ढेर सारी काली गुड़ियाँ गाँव के पेड़ों पर झूलती हुई दिखती थीं।
ऐसे माहौल में ही विलास सोलह साल का हो गया। एक दिन मांत्रिक पीपल के वृक्ष पर चढ़ा था। वक्त रात का था। वहाँ कोई नहीं था।
पता नहीं कैसे मांत्रिक का पैर फिसल गया और वह जमीन पर नहीं, बल्कि पीपल से सटे सिंदूर लगे पत्थर पर गिर गया। उसका खून पत्थर पर रिस रहा था। वह चीखा नहीं—गिरते ही उसने दम तोड़ दिया।
लोग जमा हुए तो सबने देखा कि मांत्रिक की उँगलियाँ वृक्ष की सबसे ऊँची टहनी की ओर उठी हुई थीं—वहीं, जहाँ से वह गिरा था। शायद वहाँ कोई बैठा था। हवा में पैर हिलाती, किसी बच्चे-सी आकृति उस टहनी पर थी। गाँववाले उसे देखकर सिहर गए। किसी ने पड़ताल नहीं की कि वह आकृति कौन थी।
उस रात के बाद सब कुछ जैसे ठंडा पड़ गया। गाँव में अब किसी भी पेड़ के इर्द-गिर्द वृत्त दिखाई नहीं देते थे। धीरे-धीरे पेड़ों की शाखाओं पर लटकी काली गुड़ियाँ भी कम होती गईं। फिर एक दिन ऐसा आया कि एक भी उल्टी लटकी काली गुड़िया किसी ने नहीं देखी।
जब विलास सारंगी सोलह बरस का था, उसका गाँव गांजा-मुक्त हो गया था। यह इतना आसान नहीं था—विलास ही जानता था कि उसके पिता ने सब कुछ ठीक होने के लिए क्या किया था…
तो यही था विलास सारंगी का अतीत। इस भूतकाल को कंधे पर लिए वह कैसे शादी करता? अगर करता, तो यकीनन बीस-इक्कीस साल के उसके बच्चे होते।
सारंगी आज इसी वजह से बहुत अस्वस्थ था। किसी बीस साल के छात्र ने उससे सवाल किया था। छात्र उसके न हुए बेटे की उम्र का था—अगर उसकी अपनी औलाद होती, तो क्या उसका भी यही सवाल होता?
उस छात्र ने सीधे पूछा था—“सर, गांजा पीनेवाले या बेचनेवाले लोगों तक नाबालिग कॉलेज के लड़के भी पहुँच जाते हैं, तो फिर पुलिस क्यों नहीं पहुँच पाती? ये सब बंद क्यों नहीं होता? क्या हम इसी चक्र में फँसे रहेंगे?”
सवाल ठीक निशाने पर बैठा था। इसके बाद उसे चक्कर आया। कुर्सी पर बिठाकर पानी दिया गया। भीड़ जमा हो गई—कोई कह रहा था बीपी बढ़ गया, कोई शुगर।
विलास सारंगी की बेचैनी का यही कारण था। वही सवाल उसकी अंदरूनी हालत बिगाड़ रहा था। इसी वजह से वह इतनी रात गए इस बियाबान, निर्मनुष्य माहौल में भटक रहा था।
कई दिनों की खोज के बाद उसे इस जगह के बारे में पता चला था।
यह कोई साधारण जगह नहीं थी। पेड़ों की टहनियों पर नींबू-मिर्च वाली काली गुड़ियाँ उल्टी लटकी हुई थीं। रात के अंधकार में वे भयावह दिख रही थीं। लगभग हर पेड़ के इर्द-गिर्द गोलाकार वृत्त खींचे गए थे। यही वह जगह थी, जहाँ से शहर में बिकने वाला हजारों टन गांजा आता था। यहाँ भी वही हो रहा था, जो सालों पहले उसके गाँव में हुआ था।
गाड़ी रोककर वह नीचे उतरा। अब विलास पैदल चल रहा था। उसके चमड़े के लाल जूतों की कोई आहट नहीं हो रही थी।
ढलान से उतरते हुए वह करंजी के पेड़ के पास आ गया। उल्टी लटकी गुड़िया देखना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। तने की मटमैली जमीन पर वृत्त बना था—उसकी गोल रेखाएँ गांजे से खींची गई थीं।
सारंगी के ओबड़-खाबड़ गाल तन गए। धँसी आँखों में विस्मय नहीं, बल्कि घृणा और गुस्सा था। उसका बड़ा होंठ थरथराने लगा। उसने गले में लटके लाल पंचे में राख भर ली। तेज बदबू हवाओं में फैल गई।
“गांजा कहीं भी जाए, अपनी गंध कभी नहीं छोड़ता।” पिता के सालों पुराने शब्द उसके दिमाग को छलनी कर रहे थे। उसने करंजी के पेड़ के इर्द-गिर्द बने वृत्त को पंचे में लपेटकर गाँठ मार दी—यह करना उसके पिता ने ही सिखाया था।
फिर वह पेड़ की टहनी पर चढ़ गया। उल्टी लटकी गुड़िया डर पैदा कर रही थी, लेकिन यह करना जरूरी था। जैकिट की जेब से कटर निकालकर उसने गुड़िया का सिर धड़ से अलग कर दिया।
सन्नाटा। आठ सेकंड तक कोई हलचल नहीं।
और फिर—एक चीख। कोई हाँफ रहा था, चीख रहा था। वह जो भी था, सारंगी की ओर बढ़ रहा था। लकड़बग्घे जैसी शिकारी हँसी करंजी के इर्द-गिर्द फैल गई। गहरी साँसें गर्म हवा में घुलकर आँखों में खौफ भर रही थीं।
उसे अहसास हो चुका था कि उसकी जान ही नहीं, उससे कहीं ज्यादा कुछ दाँव पर था। कोई अज्ञात अस्तित्व घास को काँपता हुआ उसकी ओर बढ़ रहा था।
डर अपनी जगह था, लेकिन उसे एक अधूरे काम के पूरा होने का सुकून भी मिल रहा था। वह जानता था कि उसके साथ क्या होने वाला है—कभी उसके पिता ने भी तो यही भुगता था। सारंगी तैयार था।
लेकिन…
आहट धीमी होती गई, जैसे वह अस्तित्व पीछे हट रहा हो।
सारंगी के गले में हुक-सी अटक गई। उसे समझ नहीं आ रहा था—ऐसा तो नहीं होना चाहिए था। उसने काली गुड़िया का सिर काटा था, फिर वह पीछे क्यों हट रहा था?
उसे अपने गंजेड़ी पिता याद आए।
सालों पहले, नाली के पास, पिता ने गांजे से गोलाकार वृत्त बनाया था। उसमें आग जलाई और बीच में बैठ गए थे। सामने वही सिंदूर लगा पत्थर रखा था—जिस पर गिरकर मांत्रिक मरा था।
पिता ने अपने खून से वृत्त बनाया और मंत्र बुदबुदाते हुए काली गुड़िया का सिर काट दिया। गंध फैली, जुबान कड़वी हुई, अंधकार छा गया। यह सब सोलह साल का विलास पेड़ के पीछे से देख रहा था।
उसी रात पिता ने कहा था—“वह मांत्रिक बस जरिया था… असली चीज़ कुछ और थी।”
और जाते-जाते उन्होंने बताया था—“विलास… वह मांत्रिक ही तेरा असली बाप था।”
विलास फूट-फूटकर रो पड़ा। इसलिए नहीं कि उसके माने हुए पिता मर गए थे—बल्कि इसलिए कि उस रात पीपल की टहनी से मांत्रिक को धक्का देने वाला वही था।
वही वह बच्चे-सी आकृति था। और अब उसे समझ आ गया था कि वह किस बोझ को ढोते हुए जी रहा है