खामोशी की सज़ा.
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घर में कोई बुज़ुर्ग नहीं था
जो कह देता—
“इतना काफ़ी है, अब रुक जाओ।”
जो हुआ
वह कम नहीं था,
और जो मेरे लिए किया गया
वह वजह के बहुत पास था—
इतना पास
कि दोष और दया
एक-दूसरे से गले मिल बैठे।
मैं पूछता रहा—
क्या था ये?
क्यों किया मैंने?
और मेरी खामोशी
सारे जवाब खा गई।
अगर कोई मुझे उकसाता,
तो मेरे तन में लगी आग
मैं खुद ही बुझा देता—
पर आग को बुझाना भी
क्या गुनाह होता है?
क्या ये नसीब था
या बस
मेरा होना
न होने के बराबर?
इसने मुझे बदल दिया।
आख़िरी उम्मीद का दिया बुझ गया—
पर राख में हाथ डालकर
मैं फिर उसे जलाऊँगा,
क्योंकि
राख मेरी नाकामयाबी नहीं
मेरी आख़िरी उम्मीद है।
किसने मारा मुझे?
मैं तो ज़िंदा हूँ—
फिर भी
अंदर कुछ मर चुका है।
जिसने मेरे लिए कुछ किया,
उसका अहसान
मैं पूरा न चुका सका—
शायद इसलिए
थकान अब
मेरी पहचान बन गई है।
क्या मुझे अभी मर जाना चाहिए
और बुझते हुए
लिखते रहना चाहिए?
मैंने कभी किसी को नहीं मारा,
फिर ये सब
मेरे साथ क्यों?
क्या मैं इंसान नहीं?
क्या मेरी भावनाएँ
गिनती में नहीं आतीं?
मैं भी रास्ते काटता हूँ—
पर जिसने मुझे तोड़ा
उसके साथ क्या हुआ?
किसने उसे छोड़ा?
ढेर सारे नक्शे बुझ गए—
मेरी तरह।
क्या कोई फर्क नहीं पड़ता?
क्या लिखना
माफी नहीं हो सकता?
क्या मैं गलती नहीं कर सकता?
मैं भी इंसान हूँ—
क्या उसने ये नहीं सोचा
कि किसलिए
मुझे मारा जा रहा है?
मैं खामोशी की सज़ा में बँधा हूँ।
किसने उसे उकसाया
कि वह मारते-मारते
और उद्विक्त हो गया?
उसके शब्दों में जादू था—
लब्जो में अल्फ़ाज़ नहीं,
बस मैं था—
और मैं ही
काफ़ी था टूटने के लिए।
ये मुझे छोड़ता नहीं—
कभी नहीं छोड़ेगा।
फिर मैं फ़िक्र क्यों करूँ
उसकी
जो अब है ही नहीं?
जीना क्या
जीवन से हार के
फासले तय करना नहीं होता?
दुःख के रास्ते पर
जो फूल खिला है—
उसका स्वाद
कितना कड़वा होता है,
क्या तुमने चखा है?
मैं मासूम नहीं
कि फिर से जुड़ जाऊँ।
यह फैसला
किसी और के लिए होगा—
मेरे लिए
ये ठहराव था।
इसने मुझे सिखाया
कि ज़रूरत
कभी जीवन से बड़ी नहीं होती।
पर ये भी भूल गया
कि कभी
मैं भी था।
मैं जो हूँ—
उसका स्वाद
वह कबका चख चुका है।
उसकी अंतिम इच्छा
मैं नहीं जानता—
पर जब तक मैं हूँ,
मेरे पास
कुछ नहीं होना चाहिए।
क्या उसके चलते
मैं रुक जाऊँ?
हरगिज़ नहीं।
कब तक सीखूँ
कि मर कर
न मरना भी
मरना ही होता है?
काफ़िर ज़िंदगी
कितनी मुश्किल है—
जब किसी के पास
अब कुछ नहीं बचता
सिवाय
उसके।
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