संक्रमण
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पहचान टूट रही है,
पर नई बनी नहीं—
मैं मलबे पर खड़ा हूँ,
जहाँ नाम गिर चुके हैं
और आईने अभी चुप हैं।
नास्तिक नहीं हूँ,
बस पुराने ईश्वर से थक गया हूँ—
वही ईश्वर
जो हर बार मेरे सवालों पर
मौन की मोहर लगा देता था।
प्रार्थनाएँ अब भी आती हैं,
पर हाथ जोड़ते हुए
मन बैठ जाता है।
अकेला हूँ,
पर यह अकेलापन सादा नहीं—
यह भीड़ से उपजा है।
लोगों के बीच
खुद को खोने का डर
जंगल से भी घना होता है।
भीड़ में खड़ा हूँ
और भीतर से गुमशुदा।
चुप हूँ—
क्योंकि शब्द
अब भरोसेमंद नहीं रहे।
हर बोला गया वाक्य
मुझे आधा कर देता है।
पर भीतर
एक रेलगाड़ी दौड़ती रहती है—
यादें, प्रश्न, पश्चाताप,
और वे सारे “काश”
जो कभी प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं उतरे।
मैं न टूट रहा हूँ,
न बन पा रहा हूँ—
मैं बस बीच में हूँ।
और शायद
सबसे कठिन जगह
यही होती है।
जहाँ आदमी
न पीछे लौट सकता है,
न आगे दौड़ सकता है—
सिर्फ़ खुद के साथ
ठहरना सीखता है।
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