इस कहानी का सीधा सीधा मतलब यही है। प्रार्थना करने से अच्छा किसी के मदद के लिया हाथ उठा लो। शायद किसी मासूम की जान बच जाए।
ये जो कहानियों या कविताओं के द्वारा मोटिवेशन होता है। वह केवल कुछ समय तक ही प्रशंसा का पात्र रहता है। इसके बाद लोग सब भूल जाते है।
_"जितना दक्षिणा के रुप में मंदिर में लिया गया"_
_"या अप्रत्यक्ष रुप से गरीबों के लिए दिया गया "_
_"उससे आप उस बच्चे को कुछ दिला सकते थे"_
_"ज्यादा नहीं तो कम से कम एक वक्त का भोजन खिला सकते थे।"_
*अगर आप को कुछ अच्छा करना है। तो सबसे पहले खुद मदत का हाथ बढ़ाएं। ओर मदत करके भूल जाएं।*
_"मदत करके उसके गुण गाना स्वार्थ है।_
_परन्तु मदद करके भूल जाना पुण्य है। "_
पूजा से ज्यादा शक्ति अच्छे कर्मों में होती है। लोगों की दुआएं वो कर दिखाती है।
जो सालों की तपस्या से मुमकिन नहीं होता।