मैं, सच्चित, एक 16 वर्षीय छात्र हूँ। यह कविता विद्रोह की नहीं, जागरण की आवाज़ है। यह उन सवालों की अभिव्यक्ति हैl जो आज का युवा, प्रकृति, अरावली और न्याय के पक्ष में उठाता है। अगर शब्द कड़े हैं, तो इसलिए क्योंकि
समय ख़ामोश रहने का नहीं है।
*अरावली-आह्वान*
स्वर्ण धारा को इन्होंने विषैल और बंजर किया,
वोटो से तुमने इन्हें जीता कर खुद ही सर पर चढ़ाया है,
उठो देश के नौजवानों, भारत माने तुम्हें बुलाया है।
जीव जंतु से ठिकाना छीना,
जनजातियों से जीने का अधिकार,
नहीं चाहिए साहिब का जय श्री राम,
मुझे मेरे अंदर के सियाराम ने जगाया है।
उठो देश के नौजवानों, भारत मां में तुम्हें बुलाया है।
जलते अरावली पर इन्होंने अपनी रोटी सेकी।
अच्छे दिनों की उम्मीदें इन्होंने जनता के मुंह पर फेंकी।
उठो देश के नौजवानों, भारत माँ ने तुम्हें बुलाया है,
चिपको शुरू कर माँ अमृता का संकल्प हम दोहराएँगे,
रास्ता कठिन है पर साथ रहे तो नया इंकलाब लायेंगे।
राजा जय सिंह जैसी सरकारें आन खड़ी,
अरावली रक्षा के लिए तेरे दर पर माँ फटी साड़ी में आन पड़ीI
100 मीटर तो बस बहाना है,
अरावली का घाव पुराना हैI
मखमली गद्दी पर बैठे साहिबान को दिखाना हैI
उठो देश के नौजवानों, भारत माँ ने तुम्हें जगाया हैI
सारे जंगल को जलाकर,
सारी पहाड़ी में खनन करवा कर,
साहिब फूले नहीं समाते हैं।
और एक पेड़ मां के नाम लगाकर,
अपने में इठलाते हैं।
उठो देश के नौजवानों, गौरा देवी ने तुम्हें बुलाया है,
राजवाड़ी, गुजराती, हरियाणवी नहीं,
हिंदी है हम, और हिंदुस्तान हमारा हैI
उठो देश के नौजवानों, भारत माँ ने दरबार लगाया हैI
सरकारों को तन, मन, धन से प्रताप की आग में जलाओ
‘करो या मरो’—
अपने भीतर के गांधी को जगा लो,
या पेहनो चूड़ियाँ तुम सब,
और मूँछें अपनी मुंडवा लो।
और वादा करता सच्चित, यूं ख़ून को ठंडा मैं होने न दूँ,
अपनी स्याही से मैं जीवित रखूं।
पर जिसके खून में देश प्रेम का उबाल नहीं,
वह ख़ून नहीं पानी है,
असल में वह मर्द नहीं, जनानी हैI
और अब—
कह दो उन बाँटने वाली सरकारों से,
उन अरावली काटने वाले व्यापारों से—
बहुत रह लिए ख़ामोश हम,
उसका मन में मेरे पश्चाताप है,
लेकिन खून में अब इंक़लाब है।
इंक़लाब ज़िंदाबाद!!
जय अरावली।
सच्चित वशिष्ठ