"खुद से हार कर"
हर रोज़ ख़ुद से थोड़ा-सा हार कर आए,
हम ज़िंदगी से यूँ ही तकरार कर आए।
ख़ामोशियों ने बोलना जब सीख लिया,
हम अपने दर्द को लफ़्ज़ों में संवार कर आए।
जो ख़्वाब आँखों में थे, आँखों ही में रहे,
हम दिल-ए-अरमानों को यूँ मार कर आए।
किसी की एक नज़र उम्र भर का क़र्ज़ बनी,
हम अपने आप को उस पर निसार कर आए।
बहुत तलाश किया हमने अपने होने को,
जहाँ मिले नहीं ख़ुद को, वहीं ठहर कर आए।
न था कोई नाम-ओ-निशां उसके दिल में मेरा,
“कीर्ति”, जब एहसास हुआ तो नकार कर आए।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️