"इश्क़ नहीं, समझ"
मुझे चाहिए कोई मेरा ही सरीखा हो,
जो मेरे टूटने का भी गवाह हो।
जो भीड़ में भी तन्हा समझ सके मुझे,
मेरी ख़ामोशियों का भी जिसे पता हो।
न पूछे बार-बार वजह उदासी की,
मेरे रोने में भी जो हमनवा हो।
न समझाए मुझे सब्र के क़ायदे,
मेरे बिखरने का भी जो आशनाँ हो।
“कीर्ति”, ये इश्क़ की आरज़ू नहीं है,
बस यही इल्तिज़ा थी, वो मेरे जैसा हो
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️