लड़के वाले बहुत सरल थे, इतने सरल कि उन्होंने साफ़-साफ़ कह दिया—
“हम दहेज नहीं लेते…
बस शादी बिना सुविधा के नहीं करते।”
लड़की के पिता ने राहत की साँस ली।
मन ही मन बोले चलो अच्छा हुआ लालची लोगों से पाला नहीं पड़ा और भगवान का नाम लिया।
लड़का पढ़ा-लिखा है।
लड़के की माँ ने सूची आगे बढ़ाई “ये कोई दहेज नहीं है,
बस कुछ जरूरी व्यवस्थाएँ हैं—
कार, फर्नीचर, एसी आदि और हाँ… लड़के की पढ़ाई पर जो खर्च हुआ था, वो तो आपको समझना ही पड़ेगा।”
पिता ने सिर हिलाया।
समझने की उम्र बहुत पहले निकल चुकी थी।
लड़की चाय लेकर आई।
उसने कप रखते हुए पूछा “आंटी, क्या इसमें GST लगेगा
या ये सब परंपरा के अंतर्गत आता है?”
कमरे में गला साफ़ करने की आवाज़ फैल गई।
लड़के के पिता मुस्कुराए “बेटी, तुम्हें मज़ाक सूझ रहा है,
असल ज़िंदगी में ऐसे सवाल नहीं पूछते।”
लड़की बोली— “असल ज़िंदगी में ही तो
लड़कियाँ बिकती हैं अंकल।”
अब तक कमरे में सन्नाटा पसर चुका था ।
लड़के ने स्थिति सँभालने की कोशिश की “देखिए, हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है, पर समाज है… लोग सवाल करेंगे।”
लड़की ने जवाब दिया—
“तो शादी हम कर रहे हैं या समाज?”
लड़के की माँ फुसफुसाईं “लड़की ज़्यादा बोलती है।”
लड़की मुस्कुरा दी—
“हाँ आंटी,
इसीलिए मेरी कीमत भी ज़्यादा लग रही है।”
लड़की बोली - चाय ठंडी हो गई और रिश्ता भी।
लड़के वाले उठे और जाते-जाते लड़की की माँ बोलीं—
“ऐसी सोच के साथ लड़की की शादी मुश्किल होती है।”
लड़की ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा— "और ऐसी शादियों के साथ लड़की की ज़िंदगी बर्बाद हो जाती हैं।”
दरवाज़ा बंद हुआ।
लड़की ने चैन की साँस ली.....।
- Dr Sonika Sharma