*ॐ नमः शिवाय*
*राधा की मौन आरती।*
एक बार राधा जी बरसाने के वन में बैठी थीं।
संध्या का समय था, मंद पवन बह रही थी, और गोकुल से बाँसुरी की मधुर धुन गूँज रही थी।
सखी ने पूछा — “राधे, तुम रोज़ उसी दिशा में क्यों देखती हो?”
राधा मुस्कुराईं —
“क्योंकि वहाँ से स्वर नहीं, स्मृति आती है…
हर स्वर के साथ कृष्ण की एक झलक उतरती है मेरे हृदय में।”
सखी बोली — “पर वो तो आज आए भी नहीं।”
राधा ने आँखें मूँद लीं और बोलीं —
“जब प्रेम सच्चा हो, तब मिलन के लिए देह नहीं,
भाव ही पर्याप्त होता है।
मैं जिस भाव में उन्हें पुकारती हूँ,
वो उसी भाव में प्रकट हो जाते हैं —
कभी हवा की छुअन में,
कभी धूप की किरण में,
कभी बस इस मौन में...”
तभी हवा से एक पुष्प गिरा —
और वह राधा के चरणों में आ टिका।
सखियाँ चकित थीं, पर राधा बस मुस्कुराईं —
“देखो सखियों, आज कृष्ण ने मौन आरती भेजी है।
भावार्थ:
जब हृदय में सच्ची भक्ति और प्रेम हो,
तो भगवान दूर नहीं रहते,
वे हर अनुभूति में उतर आते हैं —
जैसे राधा के हृदय में कृष्ण सदैव बसे हैं।
*आचार्य दीपक सिक्का*
*संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी*