कल्पना और यथार्थ के बीच एक कोमल सा अहसास...
'छायावाद' की शैली में नारी सौंदर्य को शब्दों में ढालने का एक छोटा सा प्रयास।
स्वप्न-सुंदरी :
लगती नभ की काया है,
या सपनों की छाया है?
रूप नहीं, यह जादू है,
मन पर कैसा काबू है।
नयनों में कुछ लाज भरी,
जैसे शीतल ओस झरी।
पलकें जब भी झुकती हैं,
साँसें पल भर रुकती हैं।
गति में लहरों का नर्तन,
वाणी में गूँजे सावन।
खुशबू-सी वह बहती है,
चुपके से कुछ कहती है।
लगती नहीं धरा की है,
रचना किसी 'कला' की है।
हाथ कभी न आती है,
बस सपना बन जाती है।
✍🏻©️
विनीत सिंह