दिल कहता है कि बस उसकी एक झलक पा लूँ,
मगर जब वो सामने हो… नज़रों का तआ़रुफ़ (मिलना) भी न हो पाए।
धड़कनों की रवानी (तेज़ी) बढ़ जाती है,
लबों पर ठहरे लफ़्ज़ भी यूँ बिखर से जाएँ।
लेकिन जब घड़ी की सुइयाँ 11:11 पर ठहरती हैं,
उसकी यादें दिल में एक नई बेकरारी (बेसब्री) जगा जाती हैं।
वो लम्हा… वो एहसास… ख़्वाब-सा महक उठता है,
और ज़ुबाँ पर कोई अल्फ़ाज़ (शब्द) लाने की हिम्मत भी न रह जाती है
11:11
Amrita Singh ✍🏼