Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

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"चंद्र-शल्य"
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चाँद पर पड़ी दरारें—
एक मृत नदी की स्मृतियाँ हैं,
जिसके सीने में न जाने कितनी
अनजानी तृष्णाएँ दबी थीं।

क्या कहूँ—उस रात मैंने क्या देखा?
मैंने अपने आपको अनगिन अर्थों में
धीरे-धीरे बिखरते देखा,
और चाँद के ठीक नीचे
एक परछाईं की तरह खड़ा पाया।

अब उस नदी में ऊफ़ान नहीं आता।
सागर से मिलने के बाद भी
वह सागर की न रही—
नदी की पहचान
उस संगम में कहीं खो गई।

रत्नाकर भी कब समझ पाया था
कि उसके भीतर
इच्छाओं के कितने
निर्मम शिंपले पल रहे थे?

समुद्र तो न जाने
कितनी नदियाँ भोग चुका है—
पर मैं?
मैंने तो सिर्फ़ रातों को ही जाना है।

रातें—जहाँ उगता है
शत-विशत रूपों वाला चाँद,
और जहाँ मैंने देखा है
उस मृत नदी का
कभी न बुझने वाला
अतृप्त विरह।

मैं—अभोगी।
अदास।
बस देख सकने वाला एक साक्षी।

जो देखता है
व्यथा के अंतहीन गर्त से उठती
सूची-बाणों की किरचें—
किरचें जो शरीर में अटककर
अपने आप ही
एक नया अंग बन जाती हैं।

देखने के अलावा
एक त्र्यस्त, भटका हुआ मुसाफ़िर
और कर भी क्या सकता है।
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Hindi Poem by Anup Gajare : 112007768
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