२१…“अनकहीं जगहों का दुख”
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जो बिना झगड़े चले गए,
उनकी अनुपस्थिति एक निर्वासन है—
जिसकी सज़ा मैं रोज़ काटता हूँ
अपने ही भीतर के किसी अंधे कोठरे में।
उनकी लौटती हुई परछाइयों को
मैं अपराधबोध की दृष्टि से निहारता हूँ—
जैसे भूल मेरी थी, जाने का निर्णय उनका
और सज़ा दोनों की साँझी।
कभी एक हाथ थामे था,
कभी एक बात;
फिर अचानक बात भारी पड़ गई
और हाथ—
पतझड़ में गिरते पत्ते की तरह
मेरी मुट्ठी से फिसल गया।
विदा कहना आसान नहीं होता,
पर मोहविहीन पुकारें
विदा से भी ज्यादा कटु होती हैं।
और मुझे आज भी लगता है—
सुंदर भ्रम से बेहतर है
वह असुंदर सच
जो कम-से-कम झूठ नहीं होता।
भूख से डरा आदमी
रोटी में अपना ईश्वर ढूँढ लेता है;
पर प्रेम से डरा आदमी—
किस बर्तन में पिघलाए अपनी दहशत?
किस आग में पकाए अपना भय?
मैंने देखा है—
किसी के भीतर जिये दुख
जब शब्दों में ढल जाते हैं
तो ममता मिल जाती है, सहलाती हथेलियाँ भी।
पर वही दुख
जब किसी जीवित मन में जल रहे होते हैं—
तो दुनिया मुंह मोड़ लेती है;
सहानुभूति कला के लिए आरक्षित है
और मनुष्य—
बस एक साधारण उपेक्षित पत्थर।
मेरी आस्थाओं के खंडहर में
जब गंगा का नाम आता है
तो भीतर की टूटी छतों में
एक प्रेम की हवा बहती है।
हाँ—
तुम्हारे शहर से गुजरने वाली गंगा
मेरे लिए नदी नहीं, स्मृति है।
अंततः रोना सूख गया;
सिसकियाँ चुप्पियों में बदल गईं
और चुप्पियाँ—
नयी भाषा बन गईं
जिसे कोई पढ़ नहीं पाया।
अंततः आग बुझी,
पर राख में एक ऐसी तपिश बची रही
जो पहचान से परे थी।
अंततः गति रुकी,
पर भीतर कहीं बहता रहा
एक अज्ञात, अदृश्य, अव्यक्त प्रवाह।
लोग पूछते हैं—
“और कैसे हो?”
और मैं सोचता हूँ—
अगर सच बता दूँ
तो उनके दर्पण फट पड़ेंगे।
इसलिए मैं कहता हूँ—
“ठीक हूँ।”
यह झूठ नहीं—
सभ्यता का मर्यादित सच है।
और हाँ—
हम जब रेगिस्तान में रहते हैं
तो प्यास पर नियंत्रण सीखना पड़ता है।
रेत को यह समझाने से क्या लाभ
कि वह नमी क्यों नहीं बनती?
निर्जीव चीज़ों को
उनकी कठोरता के लिए
माफ़ कर देना चाहिए—
क्योंकि उम्मीदें ही सबसे पहले
मनुष्य को रेगिस्तान बनाती हैं।
…पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती—
दुख कभी पूर्णविराम नहीं लगने देता;
वह किसी कोने में पड़ी
अधजली क़िताब की तरह
धीमे-धीमे धुआँ छोड़ता रहता है।
मैंने समझा है—
जो लोग चुपचाप चले जाते हैं,
वे अपने साथ सिर्फ उपस्थिति नहीं ले जाते,
वे समय की दिशा भी मोड़ जाते हैं।
उनके बाद
घड़ियाँ चलती तो रहती हैं,
पर बीच का समय
कहीं स्थिर होकर
अपनी धड़कन रोक देता है।
कभी-कभी लगता है
कि मैं अपने भीतर
किसी और युग में रह गया हूँ—
वह युग जहाँ
एक स्पर्श का अर्थ
पूरे धर्म की तरह था,
और एक शब्द—
पूरी प्रलय।
आज लोग बात करते हैं
जैसे बारिश में फेंकी गई रेत,
जो हाथ में टिकती नहीं;
और मैं सोचता हूँ—
संबंध आखिर किस मिट्टी से बने होते हैं
जो एक मौसम में बचपन
और अगले मौसम में
अजनबीपन उगा देते हैं?
मैं उन गलियों तक गया
जहाँ कभी तुम्हारी हँसी
धूप की तरह उतरती थी,
पर अब वहाँ सन्नाटा
इतना घना है
कि ईश्वर भी शायद
धीमे कदम रखने लगे।
क्या तुम जानती हो—
अनुपस्थिति भी एक प्रकार की उपस्थिति है,
बस उसका वजन
रीढ़ को झुकाने वाला होता है।
मैंने उस वजन को उठाते-उठाते
अपनी पीठ नहीं—
अपनी उम्र तोड़ ली।
मैं अक्सर सोचता हूँ,
अगर किसी दिन तुम लौट आओ
तो क्या मैं तुम्हें पहचान भी पाऊँगा?
क्योंकि तुम्हारी याद
अब चेहरे जैसी नहीं,
एक मौसम जैसी है—
जो आता नहीं,
पर बदलता सब कुछ है।
रात के तीन बजे
जब दुनिया सो रही होती है,
मैं अपने भीतर की
एक टूटी खिड़की के पास बैठा
उन हवाओं को सुनता हूँ
जो कभी तुम्हारे वाक्यों में बहती थीं।
अब वे हवाएँ
कुछ नहीं कहती;
बस ठंडक छोड़ जाती हैं—
उन जगहों पर
जहाँ कभी तुम्हारा हाथ था।
और मैं समझता हूँ—
कुछ लोग हमें इसलिए छोड़ जाते हैं
क्योंकि हम उनके लिए गलत नहीं—
बहुत ज्यादा सच होते हैं।
और दुनिया
इतना सच सह नहीं पाती।
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