१७…"अलविदा, मेरे ही-मैन"
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तुम हमेशा से मेरा एक हिस्सा रहे,
जैसे पसीने की हर बूँद में कोई चेहरा उतर आता हो —
जब वर्जिश की थकान ज़मीन को छूती,
तो मिट्टी पर तुम्हारी मुस्कान खिल जाती थी।
मैं शराब का एक प्याला तुम्हारे लिए भी भरता था,
वही प्याला —
जिसके सामने एक कुर्सी हमेशा खाली रहती थी।
कभी तुम बैठने वाले थे वहाँ,
अब वह खालीपन ही तुम्हारा चेहरा बन गया है।
सर्कस के राजू को सहारा देने वाले वे हाथ —
अब किसी कंधे पर धौल नहीं जमाएँगे,
किसी दोस्ती को ठहाके नहीं देंगे।
वे हाथ अब सिर्फ यादों की रेल पकड़ चुके हैं।
सामने वाली कुर्सी अब सिर्फ हवा से भरती है,
और मेरी जड़ें शराब से।
शब्द अब हवा में नहीं गूंजते,
सन्नाटा बोलता है — तुम्हारी आवाज़ में।
तुम कहते थे — “युसुफ जैसा कोई नहीं।”
मैं कहता हूँ —
“भीतर तुमने दिलीप से भी ज्यादा जगह किराए पर ले रखी थी।”
अब उस जगह पर सन्नाटा रहता है,
और दीवारों पर तुम्हारी हँसी की छाया।
अलविदा, मेरे प्यारे।
अब गाँव की मिट्टी याद आएगी
जब तुम्हारा नाम लिया जाएगा।
रेल की पटरियाँ जैसे याद बनकर दूर जाती रहेंगी,
और किसी शाम
मैं प्याला उठाकर तुम्हारे नाम का जाम भरूँगा।
शायद किसी मोबाइल में वो गाना बज उठे —
“गाड़ी बुला रही है, सिटी बजा रही है...”
और मैं सूनी आँखों से उस प्याले को देखता रह जाऊँगा,
शोले भीतर दबाकर,
धीरे से सिक्का उछालूँगा।
पर इस बार —
जय नहीं जीतेगा, दोस्त।
तुम जीत जाओगे।
रेल में बैठकर,
राजू को अलविदा कहते हुए,
तुम दूर… बहुत दूर चले जाओगे।
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