१२…"तुम प्रतीक्षा करो"
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खिड़की पर धूप उतरती है,
और मेज़ पर खुली फाइलें,
जिनके बीच कहीं एक नाम
अब भी अधूरा पड़ा है।
तुम प्रतीक्षा करो —
अपने हिस्से के प्रियजन की,
जो कभी तुम्हारे हिस्से आया नहीं।
कॉफ़ी ठंडी हो चुकी है,
घड़ी की सुई जैसे ठहर गई हो—
समय अब दफ्तर के बाहर खड़ा है।
उसके लिए कुछ कर लो —
काग़ज़ों में, साँसों में, या थके हुए
पंखों में कोई निशान छोड़ दो।
कभी तो वह लौटेगा,
जब सारी सड़कें सूनी होंगी,
और तुम अपने ही काम के बीच
उसे फिर से ढूँढते मिलोगे —
फाइलों, परछाइयों और पुराने
सपनों के ढेर के नीचे।
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